साकार पूजन में नियमों का पालन आवश्यक : गर्वित भारत शोध केंद्र

Lucknow
  • विपुल सेन ब्यूरो प्रमुख पश्चिमी भारत

नवी मुंबई खोपरखैराने स्थित ग्रामीण आदि रिसर्च एंड वैदिक इनोवेशन ट्रस्ट यानी गर्वित के द्वारा “गर्वित भारत शोध केंद्र” के अंतर्गत सनातन के कार्यों के साथ जन मानस के कृत्यों पर शोध एवं अध्ययन किया जाता है।

यह देखा गया है वर्तमान में सनातन के ज्ञान को बहुत ही विकृत रूप में भी कहीं कहीं पर प्रस्तुत किया जाता है। जिसका कारण भारत में मुगलों, अंग्रेजों और पिछली सरकारों ने सनातन को नष्ट करने में कोई भी कोर कसर बाकी नहीं रखी। सनातन को नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया और यहां तक इतिहास भी बदल दिया। इस कारण तरह-तरह की भ्रांतियां और तरह-तरह का भोंडापन सनातन में आ गया।

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि भारत के संविधान को लिखते समय आधार ग्रंथ के रूप में विवादास्पक मनुस्मृति को लिया गया। जोकि मात्र एक ऋषि के द्वारा लिखी गई वाणी है। ज्ञानमई श्रीमद्भभगवद्गीता को और अन्य को बिल्कुल दूर रखा। यह सनातन हिंदुओं में फूट डालने का और हिंदुओं को आपस में बांटने का सबसे बड़ा षड्यंत्र था।

एक और अध्ययन में और देखी गई कि सनातन के जितने भी उत्सव व पर्व है वह वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों और गैर धनाड्य वर्ग में ही मूल रूप से जीवित है। शहरों में और धनवानो के बीच यह लगभग मृत प्राय हो चुके हैं या फिर पैसे की शक्ति के प्रदर्शन तक सीमित हो चुके हैं।

सनातन पर्वों को जीवित रखने वाले ग्रामीणों को भी साकार पूजन में कुछ बातों पर ध्यान देना बेहद आवश्यक है। ब्रह्म के साकार रूप के पूजन के माध्यम से सनातन जीवन का पर्व और उत्सव मनाता है और पर्यावरण बचाने के लिए पर्यावरण के साथ जीवित रहने के लिए विभिन्न प्रकार की परंपराओं का निर्माण किया जाता है। दुखद यह होता है की विभिन्न पूजन होने के पश्चात देवी देवताओं की फोटो और पूजा इतिहास की सामग्री को किसी कचरे के ढेर में फेंक दिया जाता है जो की बेहद गलत है।

अभी हाल में ही तुलसी पूजन संपन्न हुआ तुलसी पूजन के साथ कई देवताओं की फोटो इत्यादि भी रखी गई लगाई गई और पूजन के पश्चात वह सब कचरे मे फेंकने के लिए इकट्ठा कर दी गई यह बहुत ही ग्लानीपूर्व एवं दुखद होता है।

पूजन के पश्चात बेहतर तो यह रहेगा कि आप पूजन के फूल इत्यादि इकट्ठा कर किसी वृक्ष के नीचे डाल दे अथवा मिट्टी खोदकर उसको दबा दें जिससे कि उनकी खाद बन जाए और उनके ऊपर अनावश्यक रूप से गंदगी या मल इत्यादि न फेकें जाएं। जैसा कि कचरे में फेंकने पर हो जाता है। दूसरा जो कागज पेपर पर बने हुए चित्र इत्यादि होते हैं उनको भी किसी पेड़ के नीचे रख देना चाहिए जिससे कि वह गल कर समाप्त हो जाए अथवा उनका ससम्मान के साथ प्रार्थना पूर्वक जलाकर राख बनाकर पेड़ों में डाल देनी चाहिए।

शायद इन्हीं सब कारणों से कई ऋषियों ने निराकार पूजन की बात की है क्योंकि साकार रूप देकर बाद में उन वस्तुओं का अपमान करना यह कहां तक उचित है। यह चिंतन का विषय है इस पर पहल होनी चाहिए यह सनातन की जागरूकता के लिए आवश्यक है।