योगगुरु योगानंद ने बताया स्वस्थ और सफल जीवन का सूत्र, चार औषधियों से संवरता है व्यक्तित्व

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योगगुरू योगानंद उर्फ सुरेन्द्र सिंह डबास मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले हैं और सोशल मीडिया यूट्यूब चैलन Yog Yatra Yog Journey के माध्यम से नि:शुल्क योग सिखाकर इस क्षेत्र में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। श्री योगानंद जी द्वारा जीवन की चार औषधियों के बारे में बताया गया है जो निम्न है।

चार औषधियाँ और संपूर्ण जीवन

मनुष्य जीवन को सर्वोत्तम, स्वस्थ, संतुलित और सफल बनाने के लिए भारतीय चिंतन में चार प्रमुख औषधियों का उल्लेख मिलता है। ये औषधियाँ केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति का भी आधार हैं। कहा गया है कि मनुष्य पृथ्वी पर सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है और वह संयम, जागरूकता, सरलता तथा विवेकशीलता को अपनाकर जीवन को सार्थक बना सकता है। ये चार औषधियाँ हैं— प्राण औषधि, आहार औषधि, ज्ञान (विवेक) औषधि और भाव औषधि।

1. प्राण औषधि

मन, वाणी और शरीर द्वारा किए गए प्रत्येक कार्य का आधार प्राण है। तुलसीदास ने भी इसे जीवन का मूल तत्व बताया है। भारतीय दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु पंचमहाभूत हैं तथा वायु में ही प्राण का निवास माना गया है। हमारे शरीर में प्राण रक्त वाहिनियों तथा श्वास-प्रश्वास के माध्यम से प्रत्येक अंग तक पहुंचता है। जब किसी अंग तक पर्याप्त प्राण नहीं पहुंचता, तब वह रोगग्रस्त होने लगता है।

योगशास्त्र के अनुसार काम, क्रोध और अहंकार जैसी प्रवृत्तियां प्राणशक्ति को कमजोर करती हैं। इसलिए शुद्ध वायु, नियमित प्राणायाम और संयमित जीवनशैली से प्राणशक्ति को सुदृढ़ बनाए रखना आवश्यक है।

2. आहार औषधि

शास्त्रों में कहा गया है—

“आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धिः,
सत्त्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।”

अर्थात आहार की शुद्धता से मन और बुद्धि की शुद्धि होती है तथा शुद्ध बुद्धि से श्रेष्ठ स्मरण और विवेक का विकास होता है।

मानव शरीर तीन गुणों— सत्त्व, रजस और तमस— से प्रभावित होता है। शरीर के उचित पोषण के लिए सात्विक भोजन का सेवन आवश्यक माना गया है। अनाज, फल, सब्जियां, दूध, दही और घी जैसे पदार्थ शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखते हैं। भोजन करते समय आंख, नाक, कान, त्वचा और जिह्वा का संयमित उपयोग करना चाहिए। स्वार्थ से ऊपर उठकर भगवान और समाज की सेवा का भाव भी मनुष्य को शुद्धि की ओर ले जाता है।

3. विवेक (ज्ञान) औषधि

विवेक का अर्थ है सही और गलत का निर्णय करने की क्षमता। बुद्धि का विकास ज्ञान से होता है और ज्ञान ही मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाता है।

सांसारिक सुख चार प्रकार के बताए गए हैं— सत्ता, सम्मान, संपत्ति और विषय-सुख। इनसे जुड़े चार प्रकार के दुःख भी होते हैं— परिणाम दुःख, ताप दुःख, संस्कार दुःख और गुणवृत्ति-विरोधी दुःख। इन दुःखों का निवारण केवल विवेकपूर्ण बुद्धि से ही संभव है। जब मनुष्य ज्ञान और विवेक का सहारा लेता है, तब वह परिस्थितियों का सही मूल्यांकन कर जीवन में संतुलन बनाए रखता है।

4. भाव औषधि

भाव औषधि का संबंध मनुष्य के अंतर्मन और विचारों से है। अविद्या, कामना, कर्म और विषयासक्ति मनुष्य को सांसारिक बंधनों में बांधती हैं। दूसरी ओर श्रद्धा, सेवा, करुणा, प्रेम और समर्पण जैसे भाव मनुष्य को उच्च जीवन मूल्यों की ओर ले जाते हैं।

भावनाएं ही व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। सकारात्मक भाव मन में उत्साह, ऊर्जा और प्रसन्नता का संचार करते हैं, जबकि नकारात्मक भाव तनाव, भय और अशांति उत्पन्न करते हैं। इसलिए जीवन में सद्भाव, सहानुभूति और आत्मिक उन्नति के भावों को विकसित करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

प्राण, आहार, विवेक और भाव— ये चारों औषधियाँ मनुष्य के समग्र विकास की आधारशिला हैं। प्राण शरीर को शक्ति देता है, आहार स्वास्थ्य प्रदान करता है, विवेक सही दिशा देता है और भाव जीवन को अर्थपूर्ण बनाते हैं। यदि व्यक्ति इन चारों औषधियों को अपने जीवन में अपनाए तो वह शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ, सफल और संतुलित जीवन जी सकता है।