स्काईरूट एयरोस्पेस के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की सफल उड़ान के साथ देश ने अंतरिक्ष क्षेत्र में नए दौर की शुरुआत कर दी है. यह पूरा मिशन क्या है. सरकार ने इसके लिए क्या-क्या किया है. इससे किन कंपनियों को फायदा होगा. स्पेस का बाजार कितना बड़ा है और आगे कितना जा सकता है. इन सभी बातों को डिटेल और आसान भाषा में समझने, जानने के लिए पढ़िए ये स्टोरी…
करीब छह दशक तक भारत की अंतरिक्ष यात्रा का मतलब सिर्फ ISRO ही रहा है. चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-L1 और स्पैडेक्स जैसे मिशनों ने भारत को दुनिया के चुनिंदा अंतरिक्ष देशों की कतार में खड़ा किया, लेकिन अब भारतीय स्पेस सेक्टर ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है, जहां सरकार के साथ-साथ निजी कंपनियां भी अंतरिक्ष की दौड़ में उतर चुकी हैं. इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है हैदराबाद की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस. कंपनी ने 18 जुलाई 2026 को देश के पहले निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण किया. यह उपलब्धि सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च होने की घटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि भारत अब सरकारी स्पेस मिशनों से आगे बढ़कर एक मजबूत निजी स्पेस इंडस्ट्री विकसित कर रहा है.
जिस तरह अमेरिका में नासा के साथ स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन जैसी कंपनियों ने अंतरिक्ष कारोबार का स्वरूप बदल दिया, उसी तरह भारत में भी निजी कंपनियों का दौर शुरू होता दिखाई दे रहा है. आइए भारतीय स्पेस पावर से लेकर हालिया मिशन तक सबकुछ आपको डिटेल में बताने की कोशिश करते हैं. यह सफलता अचानक नहीं मिली. इसके पीछे पिछले कुछ वर्षों में सरकार की ओर से किए गए बड़े सुधार, निजी निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियां और तेजी से विकसित होता स्टार्टअप इकोसिस्टम है. आज भारत में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप काम कर रहे हैं और सरकार अगले डेढ़ दशक में देश की स्पेस इकोनॉमी को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है. ऐसे में विक्रम-1 उस नई यात्रा का पहला बड़ा पड़ाव बन गया है.
विक्रम-1 में क्या है खास
विक्रम-1 भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट में स्थापित कर सकता है. पूरी तरह कार्बन-कंपोजिट स्ट्रक्चर से बने इस रॉकेट का वजन कम है लेकिन मजबूती ज्यादा है. इसमें ठोस ईंधन वाले बूस्टर और 3D प्रिंटेड लिक्विड इंजन का इस्तेमाल किया गया है, जो इसे आधुनिक लॉन्च व्हीकल की श्रेणी में खड़ा करता है. इस मिशन के जरिए कई भारतीय और विदेशी ग्राहकों के पेलोड अंतरिक्ष में भेजे गए. इनमें पृथ्वी की निगरानी करने वाले सैटेलाइट, नई तकनीकों का परीक्षण करने वाले उपकरण और अंतरिक्ष में मौजूद मलबे को हटाने से जुड़ी तकनीकें शामिल हैं. मिशन में दो प्रतीकात्मक पेलोड भी भेजे गए हैं. इनमें एक ‘कॉस्मिक ब्लूम’ नाम की कलाकृति और 18 कैरेट सोने से बना सूक्ष्म रॉकेट शामिल है, जिस पर भारत के महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन, विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म आकृतियां बनाई गई हैं.
सरकारी सुधारों ने कैसे बदली पूरी तस्वीर?
पहले ज्यादातर प्राइवेट कंपनियां केवल उपकरण या मशीनों के पुर्जे तैयार करती थीं, लेकिन इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023 ने पूरे सेक्टर की तस्वीर बदल दी. नई नीति के तहत निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन खोल दी गई. अब कोई भी भारतीय कंपनी रॉकेट विकसित कर सकती है, सैटेलाइट बना सकती है, लॉन्च सर्विस दे सकती है, स्पेस डेटा आधारित कारोबार कर सकती है और विदेशी ग्राहकों के साथ साझेदारी भी कर सकती है. इसके साथ ही सरकार ने IN-SPACe को निजी कंपनियों के लिए सिंगल विंडो एजेंसी बनाया, ताकि मंजूरी लेने की प्रक्रिया आसान हो और उद्योग तेजी से आगे बढ़ सके.
एक स्टार्टअप से 400 कंपनियों तक पहुंची इंडस्ट्री
सरकारी सुधारों का असर सबसे ज्यादा स्टार्टअप इकोसिस्टम में दिखाई देता है. वर्ष 2014 में भारत में स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम करने वाला सिर्फ एक स्टार्टअप था. आज यह संख्या बढ़कर 400 से अधिक हो चुकी है. इनमें रॉकेट बनाने वाली कंपनियों से लेकर सैटेलाइट, सेंसर, स्पेस डेटा एनालिटिक्स, ड्रोन, रक्षा तकनीक और पृथ्वी अवलोकन से जुड़े समाधान विकसित करने वाले स्टार्टअप शामिल हैं. इसी दौरान IN-SPACe के जरिए विकसित हो रहे स्पेस इकोसिस्टम का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2021-22 में जहां इसका राजस्व लगभग 322 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर करीब 3200 करोड़ रुपये पहुंच गया.
सरकार ने खोला निवेश का रास्ता
भारत सरकार जानती है कि केवल नियम बदलने से उद्योग नहीं बढ़ता. इसलिए निजी स्पेस कंपनियों के लिए बड़े स्तर पर वित्तीय सहायता की व्यवस्था भी की गई है. IN-SPACe के तहत शुरू की गई सीड फंड योजना के जरिए शुरुआती चरण के स्टार्टअप और MSME को एक करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जा रही है. इसके अलावा उन्हें तकनीकी सलाह, प्रशिक्षण और इंडस्ट्री से जुड़ने के अवसर भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इसी के साथ सरकार ने 1000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड भी बनाया है, जिसका उद्देश्य शुरुआती चरण की स्पेस कंपनियों में निवेश बढ़ाना है. यह फंड 2025-26 से अगले पांच वर्षों तक चरणबद्ध तरीके से निवेश करेगा. तकनीक को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने के लिए 500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड भी शुरू किया गया है. इसके तहत स्टार्टअप और MSME को परियोजना लागत का 60 प्रतिशत तक और बड़ी कंपनियों को 40 प्रतिशत तक सहायता दी जाएगी. इससे नई तकनीकों का व्यावसायीकरण तेज होगा.
IN-SPACe का जिक्र दो-तीन बार हो गया हो पहले इसे भी थोड़ा समझते चलते हैं. यह भारत सरकार की वह संस्था है, जिसे निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को स्पेस सेक्टर में बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है. यह निजी कंपनियों को लॉन्च, सैटेलाइट, परीक्षण और अन्य स्पेस गतिविधियों के लिए मंजूरी, तकनीकी सहयोग और मार्गदर्शन देती है. इसका उद्देश्य ISRO और निजी उद्योग के बीच सेतु बनाकर भारत के स्पेस इकोसिस्टम और स्पेस इकोनॉमी का तेजी से विस्तार करना है.
भारत की अर्थव्यवस्था को कितना फायदा होगा?
दुनिया में छोटे सैटेलाइट की मांग तेजी से बढ़ रही है. इंटरनेट, संचार, मौसम, रक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और पृथ्वी की निगरानी जैसे क्षेत्रों में हजारों नए सैटेलाइट लॉन्च किए जाने हैं. ऐसे में भारत के लिए बड़ा अवसर तैयार हो रहा है. भारत की लॉन्चिंग लागत अमेरिका और यूरोप की तुलना में काफी कम मानी जाती है. यही कारण है कि यदि भारतीय निजी कंपनियां नियमित व्यावसायिक लॉन्च करने लगती हैं तो उन्हें दुनिया भर की कंपनियों से ऑर्डर मिल सकते हैं. इससे विदेशी मुद्रा की कमाई बढ़ेगी, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग को गति मिलेगी और लाखों युवाओं के लिए उच्च कौशल वाली नौकरियां भी पैदा होंगी. आने वाले वर्षों में स्पेस सेक्टर भारत के लिए आईटी उद्योग की तरह एक बड़ा निर्यात क्षेत्र बन सकता है.
