डिग्री और कौशल के अंतर को पाटना भारत के रोजगार भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत : डॉ. राजेश्वर सिंह

Lucknow
  • सरकार नियमित रूप से आयोजित करे ‘रोजगार एवं कौशल संवाद’, विश्वविद्यालयों में शुरू हों 3, 6 और 12 माह के रोजगारपरक पाठ्यक्रम
  • उद्योग जगत केवल प्रतिभाओं की भर्ती तक सीमित न रहे, प्रशिक्षण और प्रशिक्षुता के माध्यम से प्रतिभा निर्माण की जिम्मेदारी भी निभाए
  • भर्ती प्रक्रिया अधिक मानवीय और संभावनाओं पर आधारित हो, हर युवा केवल बायोडाटा या अंक नहीं, एक परिवार की उम्मीद है

लखनऊ। सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने भारत के युवाओं को भविष्य की बदलती रोजगार आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने के लिए केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रियों को पत्र लिखकर सरकार, उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों के बीच समन्वय को और मजबूत करने का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि देश की युवा शक्ति को रोजगार के लिए तैयार करने में केवल डिग्री प्रदान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा और उद्योग की वास्तविक जरूरतों के बीच मौजूद कौशल अंतर को दूर करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि भारत तेजी से बदलती तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और नए उद्योगों के दौर में प्रवेश कर रहा है। ऐसे समय में आज प्राप्त की गई डिग्री जीवनभर के रोजगार की गारंटी नहीं हो सकती। युवाओं को लगातार नए कौशल सीखने और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को तैयार करने के अवसर उपलब्ध कराने होंगे।

  • रोजगार योग्य युवाओं की संख्या बढ़ाना बड़ी चुनौती

डॉ. सिंह ने कहा कि इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार भारत में रोजगार योग्यता 54.81 प्रतिशत से बढ़कर 56.35 प्रतिशत हुई है। यह सुधार उत्साहजनक है, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में युवाओं को उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप तैयार किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने विश्व आर्थिक मंच की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2030 तक वर्तमान कौशलों में लगभग 39 प्रतिशत बदलाव आ सकता है या उनमें से कुछ कौशल अप्रासंगिक हो सकते हैं। ऐसे परिदृश्य में युवाओं को केवल एक बार प्रशिक्षण देने के बजाय निरंतर कौशल उन्नयन और पुनःकौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था को शिक्षा और रोजगार व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में वही युवा अधिक सफल होंगे, जो बदलती तकनीक और उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार लगातार अपने कौशल को विकसित करते रहेंगे।

  • हर तीन से पांच वर्ष की जरूरत का हो पूर्व आकलन

डॉ. राजेश्वर सिंह ने सरकार को सुझाव दिया कि उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधियों, मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, विश्वविद्यालयों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों और कौशल विकास संस्थानों के साथ नियमित रूप से रोजगार एवं कौशल संवाद आयोजित किए जाएं। उन्होंने कहा कि इन संवादों के माध्यम से अगले तीन से पांच वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में कितने मानव संसाधन की आवश्यकता होगी और किस प्रकार के कौशल की मांग बढ़ने वाली है, इसका पूर्व आकलन किया जा सकता है। उनके अनुसार यदि उद्योग की भविष्य की जरूरतों का समय रहते अनुमान लगा लिया जाए तो विश्वविद्यालय और प्रशिक्षण संस्थान उसी अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार कर सकेंगे। इससे शिक्षा पूरी करने के बाद युवाओं और उद्योगों के बीच मौजूद दूरी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • विश्वविद्यालयों में शुरू हों रोजगारपरक अल्पकालिक पाठ्यक्रम

डॉ. सिंह ने विश्वविद्यालयों में कौशल उन्नयन एवं पुनःकौशल केंद्र स्थापित किए जाने का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में केवल पारंपरिक डिग्री पाठ्यक्रमों तक सीमित रहने के बजाय युवाओं को कम अवधि में रोजगार के लिए तैयार करने वाले पाठ्यक्रम भी शुरू किए जाने चाहिए। उन्होंने तीन माह, छह माह और एक वर्ष की अवधि वाले रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू करने का सुझाव देते हुए कहा कि इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, अर्धचालक, उन्नत विनिर्माण और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी जैसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे पाठ्यक्रमों में केवल सैद्धांतिक ज्ञान देने के बजाय उद्योग आधारित प्रशिक्षण, परियोजना कार्य, व्यावहारिक अनुभव और रोजगार से जुड़ी दक्षताओं को प्रमुखता दी जानी चाहिए।

  • उद्योग जगत की भूमिका केवल भर्ती तक सीमित न रहे

डॉ. राजेश्वर सिंह ने उद्योग जगत से भी अपनी भूमिका को व्यापक बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कंपनियों को केवल तैयार प्रतिभाओं की तलाश करने और उन्हें नियुक्त करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रतिभा निर्माण में भी सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। उन्होंने प्रशिक्षण, प्रशिक्षुता, इंटर्नशिप और नवयुवा प्रतिभा कार्यक्रमों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उनका कहना है कि यदि उद्योग संस्थानों के साथ मिलकर युवाओं को वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव उपलब्ध कराएगा तो विद्यार्थियों को रोजगार के लिए आवश्यक व्यावहारिक कौशल पहले से ही प्राप्त हो सकेगा। उन्होंने कहा कि कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, प्रबंधकों और वरिष्ठ नेतृत्व को समय-समय पर नए कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षुता, इंटर्नशिप और युवा प्रतिभा कार्यक्रमों की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करनी चाहिए।

  • भर्ती प्रक्रिया में बढ़े मानवीय संवेदनशीलता

डॉ. राजेश्वर सिंह ने भर्ती प्रक्रिया में मानवीय संवेदनशीलता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया केवल बायोडाटा छंटाई, अंकों, डिग्री, कंप्यूटर आधारित चयन प्रणाली और कठोर पात्रता मानकों की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी उम्मीदवार की वर्तमान कौशल कमी को देखते हुए उसे तुरंत अस्वीकार करने के बजाय उसकी सीखने की क्षमता, प्रतिभा, मेहनत और भविष्य की संभावनाओं का भी आकलन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने अनुभवों में मैंने कई बार महसूस किया है कि मानव संसाधन प्रक्रियाओं को और अधिक मानवीय, संवेदनशील और संभावनाओं पर आधारित बनाने की आवश्यकता है। हर आवेदक केवल बायोडाटा या आवेदन संख्या नहीं है। वह किसी का बेटा या बेटी है और उसके पीछे परिवार की वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदें हैं। किसी युवा को केवल उसकी वर्तमान कौशल कमी के आधार पर अस्वीकार करने के बजाय यह भी देखा जाना चाहिए कि उसमें क्षमता कितनी है और प्रशिक्षण देकर उसे कितना आगे बढ़ाया जा सकता है।

  • प्रतिभा की पहचान और प्रशिक्षण पर हो जोर

डॉ. सिंह ने कहा कि उद्योगों को ऐसे युवाओं की पहचान करनी चाहिए जिनमें सीखने और आगे बढ़ने की क्षमता है। यदि किसी युवा में आवश्यक कौशल का कुछ हिस्सा कम है, तो उसे प्रशिक्षण देकर बेहतर कर्मचारी के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ‘प्रतिभा को केवल तलाशना नहीं, प्रतिभा को तैयार करना’ उद्योग जगत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। इससे कंपनियों को भी भविष्य के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध होगा और युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे।

  • सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत के बीच बने मजबूत सेतु

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि सरकार ने कौशल विकास और रोजगार के क्षेत्र में मजबूत आधार तैयार किया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, उद्योग जगत और शिक्षा संस्थानों के बीच समन्वय को और प्रभावी बनाया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार ने कौशल विकास और रोजगार के लिए मजबूत ढांचा तैयार किया है। अब सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत के और निकट समन्वय तथा अधिक मानवीय भर्ती संस्कृति के माध्यम से भारत की युवा शक्ति को भविष्य के लिए तैयार कार्यबल में बदलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया की बड़ी युवा आबादी है और यदि इस युवा शक्ति को सही शिक्षा, आधुनिक कौशल, व्यावहारिक प्रशिक्षण और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं तो यही जनसांख्यिकीय शक्ति भारत को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत बना सकती है।

डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि डिग्री और रोजगार के बीच की दूरी कम करना केवल युवाओं की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार को नीति और अवसर देने होंगे, विश्वविद्यालयों को बदलती जरूरतों के अनुरूप शिक्षा देनी होगी और उद्योगों को प्रशिक्षण एवं प्रतिभा निर्माण में सक्रिय भागीदार बनना होगा। यही त्रिस्तरीय साझेदारी भारत के रोजगार भविष्य को अधिक मजबूत, समावेशी और युवा-केंद्रित बना सकती है।