- परिजनों का आरोप—हेमेटोलॉजी में नहीं मिल सका वेंटिलेटर सपोर्ट, पल्मोनरी क्रिटिकल केयर में भी नहीं मिली जगह; बोले- पहुंच होती तो शायद बच जाती जान
लखनऊ।किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में ब्लड कैंसर से पीड़ित शैलेश दुबे की मौत के बाद क्रिटिकल केयर व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं। परिजनों का आरोप है कि हालत गंभीर होने के बावजूद मरीज को समय पर वेंटिलेटर नहीं मिल सका। हेमेटोलॉजी विभाग से लेकर पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर विभाग तक भर्ती के प्रयास किए गए, लेकिन मरीज को जगह नहीं मिली। परिजनों के मुताबिक शैलेश दुबे हेमेटोलॉजी विभाग में इलाज करा रहे थे। दो दिन पहले रात में उनकी हालत अचानक बिगड़ गई। सांस लेने में परेशानी बढ़ने पर वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। आरोप है कि विभाग में उपलब्ध व्यवस्था के बावजूद मरीज को समय रहते वेंटिलेटर पर नहीं लिया जा सका।
- जूनियर डॉक्टरों ने बताई तकनीकी दिक्कत
परिजनों का दावा है कि ड्यूटी पर मौजूद जूनियर डॉक्टरों ने वेंटिलेटर लगाने में तकनीकी परेशानी बताई। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि समस्या मरीज की श्वासनली में ट्यूब डालने यानी Endotracheal Intubation, वेंटिलेटर सेटिंग या मरीज की गंभीर स्थिति से जुड़ी थी। परिवार का कहना है कि जब हेमेटोलॉजी में व्यवस्था नहीं हो सकी तो मरीज को पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर विभाग में शिफ्ट कराने का प्रयास किया गया।
- पल्मोनरी क्रिटिकल केयर में बेड होने का दावा, फिर भर्ती क्यों नहीं?
परिजनों का आरोप है कि प्रो. वेद प्रकाश के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर विभाग में उस समय कुछ बेड खाली नजर आ रहे थे, इसके बावजूद शैलेश दुबे को भर्ती नहीं किया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी इसकी पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में सवाल है कि उस रात विभाग के ICU में वास्तव में कितने बेड खाली थे और मरीज को वहां भर्ती नहीं करने का चिकित्सकीय कारण क्या था। KGMU की वेबसाइट पर पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर विभाग में 30 बेड के Respiratory ICU सहित क्रिटिकल केयर सुविधाओं का उल्लेख है।
- परिजन बोले—सिफारिश होती तो शायद मिल जाता बेड
मृतक के परिजनों ने अस्पताल की व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि प्रभावशाली लोगों या VIP सिफारिश आने पर क्रिटिकल केयर में तेजी से व्यवस्था हो जाती है, जबकि आम मरीजों को बेड न होने की बात कहकर लौटा दिया जाता है। परिवार का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री कार्यालय, शासन या किसी वरिष्ठ अधिकारी की सिफारिश होती तो शायद मरीज को समय पर बेड मिल जाता। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
- कुलपति तक पहुंची बात, राहत नहीं मिली
परिजनों का दावा है कि मरीज की गंभीर हालत की सूचना रात में कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद तक भी पहुंचाई गई थी। इसके बावजूद मरीज को तत्काल क्रिटिकल केयर सुविधा नहीं मिल सकी। परिवार का कहना है कि मरीज पहले से अस्पताल में भर्ती था, डॉक्टर मौजूद थे और संस्थान में कई क्रिटिकल केयर यूनिट हैं। इसके बावजूद अंतिम समय में वेंटिलेटर और ICU बेड क्यों नहीं मिल पाया, इसकी जांच होनी चाहिए।
- रिकॉर्ड सामने आए तो साफ होगी स्थिति
मामले की वास्तविक स्थिति KGMU के ICU बेड ऑक्यूपेंसी रिकॉर्ड, मरीज की केस शीट, रेफरल रिकॉर्ड और एडमिशन रजिस्टर की जांच से स्पष्ट हो सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि गंभीर मरीज को क्रिटिकल केयर में भर्ती करने का आधार केवल मरीज की चिकित्सकीय प्राथमिकता है या सिफारिश भी व्यवस्था को प्रभावित करती है।
KGMU से तीन सवाल
◾घटना वाली रात हेमेटोलॉजी और पल्मोनरी क्रिटिकल केयर में कितने ICU और वेंटिलेटर बेड उपलब्ध थे?
◾शैलेश दुबे को पल्मोनरी क्रिटिकल केयर में भर्ती नहीं करने का क्या कारण दर्ज किया गया?
◾गंभीर मरीजों के ICU एडमिशन की प्राथमिकता तय करने की व्यवस्था क्या है?
पक्ष: समाचार लिखे जाने तक पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर विभाग, हेमेटोलॉजी विभाग और KGMU प्रशासन का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका। पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
