Bigg Boss Casting Crisis: एक दौर था जब ‘बिग बॉस’ के घर में कोई टीवी एक्टर कदम रखता था, तो भले ही मुकाबला कड़ा हो, लेकिन उनके करियर और तजुर्बे की एक अनकही इज्जत हुआ करती थी, श्वेता तिवारी, जूही परमार, उर्वशी ढोलकिया, हिना खान से सिद्धार्थ शुक्ला तक, इन सितारों ने जब भी शो का रुख किया, तो अपने स्टारडम की चमक से टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. लेकिन आज अगर आप पिछले कुछ सीजनों की कास्टिंग शीट उठाकर देखें, तो टीवी इंडस्ट्री के नामी चेहरे, बड़े डेली सोप्स के लीड एक्टर्स और ए-लिस्ट सितारे इस शो का नाम सुनते ही हाथ जोड़ने लगे हैं.
वहीं दूसरी तरफ, ‘खतरों के खिलाड़ी’ या डांस रियलिटी शोज में यही सितारे खुशी-खुशी हिस्सा लेते हैं. तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि टीवी का सबसे बड़ा शो आज बड़े चेहरों के अकाल से जूझ रहा है? इनसाइड चर्चाओं और हालिया ट्रेंड्स को समझें, तो इसके पीछे वो कड़वे कारण हैं, जिन्होंने इस शो को कलाकारों के लिए खतरनाक बना दिया है
एक्टर्स की खुलेआम बेइज्जती
बिग बॉस में अब एक दूसरे की के लिए ‘म्यूचुअल रिस्पेक्ट’ खत्म सा हो गया है. जब से शो में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की फौज घुसी है, टीवी एक्टर्स के वजूद को ही कम आंका जाने लगा है. एल्विश यादव और अभिषेक मल्हान वाले सीजन को याद कीजिए, जहां सालों से टीवी पर खून-पसीना बहाने वाले कलाकारों का सिर्फ इसलिए मजाक उड़ाया गया क्योंकि उनके पास करोड़ों ‘इंस्टा फॉलोअर्स’ नहीं थे. टीवी को ‘सास-बहू का घिसा-पिटा ड्रामा’ कहकर नीचा दिखाया गया.
यही बदतमीजी बाद के सीजनों में भी देखने को मिली. झगड़ों में तमीज और शालीनता की सीमाएं टूट चुकी हैं. जो एक्टर 15-20 साल से घर-घर में पहचाना जाता है, वो किसी 20 साल के इन्फ्लुएंसर के मुंह से ये सुनने बिग बॉस में क्यों जाएगा कि तेरी तो रील्स पर रीच ही नहीं है, बाहर तुझे जानता कौन है? ए लिस्टर तो दूर की बात है, कोई भी स्वाभिमानी कलाकार नेशनल टीवी पर अपने पूरे करियर की ऐसी फजीहत नहीं कराना चाहता.
2. झगड़ों का दायरा खत्म, अब सीधे साख पर वार
पहले जब सिर्फ एक्टर्स ही कंटेस्टेंट बनकर आते थे, तब भी लड़ाइयां और ड्रामे होते थे. लेकिन वो टास्क, किचन या गेम तक सीमित रहते थे. वहां एक सीमा तय थी. कोई किसी के काम, इंडस्ट्री या हुनर का सरेआम तमाशा नहीं बनाता था. लेकिन अब तो शो में आते ही कलाकारों के पर्सनल स्ट्रगल और करियर को हथियार बनाकर जलील किया जाता है. चंद हफ्तों की फुटेज के लिए सालों से कमाई ‘इमेज’ का कबाड़ा हो जाना तय दिखता है.
3. टीवी ही है बिग बॉस की असली रीढ़, फिर भी अनदेखी
मेकर्स शायद भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया की हवा चाहे कितनी भी तेज हो, बिग बॉस की असली नींव हमेशा टीवी का वो लॉयल दर्शक रहा है जो रात को रिमोट थामकर बैठता है. टीवी एक्टर्स की अपनी एक मजबूत और ऑर्गेनिक साख होती है. लेकिन घर के भीतर अब जब इन्फ्लुएंसर्स की डिजिटल आर्मी और रील्स कल्चर को ज्यादा तवज्जो मिलने लगी है, तो टीवी के मंझे हुए कलाकारों को लगने लगा है कि ये मंच अब उनके क्राफ्ट और सम्मान का नहीं, बल्कि सस्ती पब्लिसिटी का अखाड़ा बन चुका है.
4. 100 दिनों की सख्त कैद और बड़े प्रोजेक्ट्स का नुकसान
‘खतरों के खिलाड़ी’ की शूटिंग 30-40 दिनों में विदेश के एक शेड्यूल में पूरी हो जाती है. नेटफ्लिक्स का ‘लॉक अप’ भी बहुत कम समय का शो था. वहीं बिग बॉस पूरे 100 से 120 दिन मांगता है. आज के ओटीटी और फास्ट-मूविंग दौर में कोई भी लीड एक्टर चार महीने तक बाहरी दुनिया से कटकर खुद को कमरे में बंद नहीं रखना चाहता. इसका सीधा मतलब है, हाथ में आए 2-3 बड़े वेब शोज और लाखों के एंडोर्समेंट गंवाना.
5. डिजिटल वोट बैंक की आंधी और अनफेयर मुकाबला
टीवी एक्टर्स की ऑडियंस पारिवारिक है, जो शो का आनंद लेती है, लेकिन पागलों की तरह मोबाइल पर फेक अकाउंट बनाकर लाखों वोट नहीं डालती. लेकिन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के पास ऐसी ब्लाइंड फॉलोइंग होती है जो दिन-रात बॉट्स और कैंपेन चलाकर वोटिंग ट्रेंड्स को हाईजैक कर लेती है. ऐसे में किसी भी मशहूर टीवी स्टार के लिए ये मुकाबला पहले दिन से ही बेमानी और एकतरफा हो जाता है.
6. अब ‘करियर रिवाइवल’ नहीं, ट्रोलिंग का खतरा
पहले माना जाता था कि अगर किसी स्टार का करियर धीमा पड़ा है, तो बिग बॉस उसे दोबारा नई उड़ान देगा. लेकिन अब ये शो काम दिलाने की गारंटी कम और सोशल मीडिया पर ट्रोल्स की गालियां खाने का जरिया ज्यादा बन गया है. मेकर्स के नैरेटिव और एडिटेड फुटेज के फेर में कब कौन ‘विलेन’ बन जाए, इसका कोई भरोसा नहीं रहता.
यही वजह है कि अब सलमान खान के इस विशाल सेट पर टीवी के मंझे हुए सितारे आने से बच रहे हैं. जब तक शो के भीतर आर्टिस्ट्स के काम का सम्मान और फेयर गेम का भरोसा वापस नहीं लौटता, तब तक इंडस्ट्री के ए-लिस्टर्स इस अखाड़े से दूरी ही बनाए रखेंगे.
