जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और आईआईटी कानपुर ने मिलकर चिकित्सा क्षेत्र में ऐसा शोध किया है, जिससे इलाज के दूसरे हफ्ते में ही पता चल जाएगा कि डिप्रेशन (अवसाद) की दवा असर करेगी या नहीं। इस शोध में ”मस्तिष्क और पेट के संबंध” पर अध्ययन करके यह पता लगाया गया है कि पेट की स्थिति का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
इससे डॉक्टरों के लिए इलाज की शुरुआत में ही यह तय करना आसान होगा कि किस मरीज को कौन सी एंटीडिप्रेसेंट दवा फायदा पहुंचाएगी, जिससे मरीजों का सही वर्गीकरण करके उन्हें लंबे समय तक बेअसर दवाएं खाने से बचाया जा सकेगा।
आईआईटी और जीएसवीएम दोनों संस्थानों की एथिक्स कमेटी से मंजूर किए गए डिप्रेशन की दवा के इस क्लिनिकल ट्रायल को आधिकारिक रूप से रजिस्ट्री में भी दर्ज किए जाने के साथ ही वैश्विक स्तर पर भी मान्यता मिली है, और प्रतिष्ठित जर्नल ‘फ्रंटियर्स’ में प्रकाशित किया गया है।
इस शोध अध्ययन में मस्तिष्क और पेट के संबंध से यह समझने का प्रयास किया गया है कि पेट और आंतों की विद्युत गतिविधियों का मरीज के मस्तिष्क और मूड पर क्या असर पड़ता है। इसके लिए डिप्रेशन के मरीज का ईईजी और ईजीजी टेस्ट किया जाएगा, जिनकी तरंगें दवा के असर का कच्चा चिट्ठा खोल देंगी, और डॉक्टरों को जल्दी ही पता चल जाएगा कि मरीज की दवा बदलने की जरूरत है भी या नहीं। सटीक चिकित्सा को बढ़ावा देने वाले इस शोध से डिप्रेशन का अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत इलाज संभव होगा।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला के निर्देशन में इस स्टडी को मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी और उनकी टीम की डॉ. आयुषी सिंह व कृतिका चावला ने आईआईटी कानपुर के न्यूकॉग्निटिव विभाग की फैकल्टी डॉ. प्रगति बाला सुब्रमण्यम अश्विन फ्रांसिस, डॉ. आलोक बाजपेयी और हरि तिवारी के साथ मिलकर नैतिक नियमों के तहत पूरा किया है।
शोध के दौरान टीम ने मरीज के इलाज के दौरान तीन बार उनकी जांच और रिकार्डिंग की। इसके लिए 100 मरीजों का पंजीकरण किया गया। इनमें से 82 मरीजों ने शुरूआती ईजीजी और ईईजी टेस्ट कराया, जबकि 42 मरीज फॉलोअप के लिए आए। एक माह बाद हुई तीसरी और आंतिम विजिट में 38 मरीज पहुंचे।
