बरेली मंडल में हेपेटाइटिस के बढ़ते खतरे के बीच स्वास्थ्य विभाग जांच तक की हालत में नहीं है। मरीज जांच के लिए भटक रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों में वायरल लोड जांचने की किट ही नहीं हैं। हेपेटाइटिस-बी, जो सबसे खतरनाक संक्रमण है-बदायूं में उससे ग्रसित करीब 300 मरीजों का इलाज चल रहा है। सैकड़ों मरीज जांच की कतार में खड़े हैं। जिनका ब्लड सैंपल लिया जा चुका है, उसके नमूने भी किट की राह ताक रहे हैं। हैरानी की बात ये है कि इसके गंभीर खतरे को जानकर भी स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार बेफिक्र हैं।
लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (केजीएमयू) में वायरल लोड की सुविधा थी। जिलो से सैंपल लेकर वहां भेजे जाते थे। लेकिन अब जिलों की सैंपल जांचने की सुविधा रोक दी गई है। इससे जिलों में जांच का भार बढ़ गया है। चूंकि जिला अस्पताल और स्थानीय सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी जांच किट उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए मरीज भटकने को मजबूर हैं।
बदायूं के जिला अस्पताल के प्रयासों से राजकीय मेडिकल कालेज में कुछ वायरल लोड किया जा रहा है लेकिन यहां से जांच रिपोर्ट मिलने में एक महीने तक का वक्त लग रहा है। इससे मरीजों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सैकड़ों में है मरीजों की संख्या
बदायूं में हेपेटाइटिस के मरीजों की संख्या हजारों में बताई जा रही है। जिला अस्पताल में निशुल्क जांच और उपचार किया जाता था। जिला अस्पताल से सैंपल केजीएमयू, लखनऊ भेजे जाते थे। वहां से 20 से 25 दिन में जांच रिपोर्ट मिल जाती थी। उससके बाद जिला अस्पताल में मरीज का इलाज शुरू कर दिया जाता था। लेकिन बीते अप्रैल माह से लखनऊ स्थित केजीएमयू में हेपेटाइटिस के सैंपल नहीं लिए जा रहे हैं। वहां पर जांच किट उपलब्ध न होने का हवा देकर कई बार सैंपल वापस कर दिए गए। इसलिए अब बदायूं से लखनऊ सैंपल भेजना बंद कर दिया गया।
बदायूं जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. एसएम कमल ने बताया कि स्थानीय स्तर पर राजकीय मेडिकल कालेज में वायरल लोड किया रहा है। जिला अस्पताल से वहां सैंपल भेजे गए हैं लेकिन अभी रिपोर्ट नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि राजकीय मेडिकल कालेज में भी वायरल लोड की भरपूर किट नहीं हैं।
रोजाना 50 सैंपल तक जांच
कालेज प्रबंधन के पास जो जांच किट हैं उनसे काम चलाया जा रहा है। अभी यहां 50 से 55 ब्लड सैंपल ही लिए जा रहे हैं जबकि जिला अस्पताल में करीब एक हजार से अधिक सैंपल जांच के लिए रखे हैं। सवाल ये है कि उन्हें कहां भेजा जाए? ऐसे में उन मरीजों का क्या, जो शायद संक्रमित हों और जांच के इंतजार में उनका इलाज ठहरा है।
पूरे मंडल के एक जैसे हाल
यह हालात केवल बदायूं की नहीं है, बल्कि पूरे मंडल का कमोबेश यही हाल है। हेपेटाइटिस संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। इस बीच सरकारी अस्पतालों में जांच और उपचार के भरपूर इंतजाम नहीं है। मजबूरन मरीज हजारों रुपये खर्च करके प्राइवेट अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं।
खतरनाक है हेपेटाइटिस-बी
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. एसएम कमल ने बताया कि हेपेटाइटिस-बी काफी खतरनाक होता है। समय पर इलाज न मिलने से मरीज के लिए खतरा बढ़ जाता है। हेपेटाइटिस-ए और सी समेत अन्य ग्रुप के संक्रमण थोड़े कम गंभीर हैं। जनपद में हेपेटाइटिस-बी के करीब 300 मरीज हैं। उनका उपचार चल रहा है। जो मरीज निजी लैब से अपनी जांच कराकर रिपोर्ट लाते हैं उनका इलाज शुरू कर दिया जाता है। प्राइवेट जांच कराने पर मरीजों को तीन-चार हजार रुपये खर्च करना पड़ता है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को मुश्किलें आती हैं।
