दीपावली पर घरों को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों के पीछे कुम्हारों की महीनों की मेहनत और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा छिपी होती है। कहीं मिट्टी को गूंथा जाता है तो कहीं चाक पर उसे आकार देकर दीये तैयार किए जाते हैं। माल विकासखंड के नारायणपुर गांव निवासी रामकिशोर प्रजापति का परिवार भी इसी पुश्तैनी हुनर को संजोए हुए है। दीपावली नजदीक आते ही परिवार के सभी सदस्य दीये बनाने में जुट जाते हैं। इस बार परिवार ने करीब 15 से 20 हजार दीये तैयार करने का लक्ष्य रखा है।
रामकिशोर बताते हैं कि दीये बनाने का काम उनके परिवार में कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। दीपावली के समय काम बढ़ जाता है और परिवार का हर सदस्य इसमें सहयोग करता है। पिछले वर्ष करीब 10 से 12 हजार दीये तैयार किए गए थे। इस बार मांग को देखते हुए उत्पादन बढ़ाने की तैयारी है। एक दिन में करीब एक हजार से 1500 दीये बनाए जाते हैं। बाजार में एक दीया करीब एक रुपये में बिकता है।
इलेक्ट्रॉनिक चाक से आसान हुआ काम
रामकिशोर के मुताबिक, सरकार की ओर से मिले इलेक्ट्रॉनिक चाक से दीये बनाने का काम काफी आसान हुआ है। पहले चाक को हाथों से चलाना पड़ता था, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने से मेहनत कम हुई है और काम में सुविधा मिली है। इससे कम समय में अधिक दीये तैयार करने में मदद मिलती है।
तालाब की मिट्टी से चाक तक का सफर
दीये बनाने की प्रक्रिया तालाब से मिट्टी लाने के साथ शुरू होती है। मिट्टी को पानी में गलाकर अच्छी तरह गूंथा जाता है। इसके बाद चाक पर रखकर दीये का आकार दिया जाता है। तैयार दीयों को सुखाने के बाद पकाने की तैयारी होती है।दीयों को पकाने के लिए उपलों और लकड़ी की सहायता से भट्ठी तैयार की जाती है। उसमें दीये रखकर ऊपर से गीली मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है। इसके बाद आग जलाकर उन्हें पकाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में करीब छह से आठ घंटे लगते हैं।
एक दीये पर 50 से 60 पैसे की लागत
रामकिशोर के मुताबिक, एक दीया बनाने में करीब 50 से 60 पैसे की लागत आती है। तैयार दीये बाजार में बिक्री के लिए भेजे जाते हैं। कुछ ग्राहक सीधे घर से भी दीये खरीदते हैं। बाजार में एक दीया करीब एक रुपये में बिकता है। दीपावली के समय बिक्री बढ़ने से परिवार को अच्छी आमदनी की उम्मीद रहती है।
हालांकि, बिजली से चलने वाले सजावटी उपकरणों के बढ़ते चलन का असर मिट्टी के दीयों की बिक्री पर भी पड़ा है। रामकिशोर बताते हैं कि दीये बनाने का काम दीपावली के समय ही अधिक रहता है। बाकी दिनों में यह काम धीमा पड़ जाता है। ऐसे में त्योहार के दौरान होने वाली बिक्री परिवार की आमदनी का महत्वपूर्ण सहारा बनती है।
पढ़ाई के साथ हुनर भी सीख रहे बच्चे
परिवार के बच्चे पढ़ाई के साथ दीये बनाने में भी हाथ बंटाते हैं। स्कूल से लौटने के बाद वे परिवार के सदस्यों के साथ काम करते हैं। रामकिशोर का कहना है कि बच्चे अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान दे रहे हैं और पुश्तैनी काम में भी सहयोग करते हैं। परिवार चाहता है कि बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ें और अपने पारंपरिक हुनर को भी न भूलें।
अच्छी कमाई से जरूरतें पूरी करने की उम्मीद
रामकिशोर बताते हैं कि इस बार अच्छी आमदनी होने पर परिवार के सदस्यों की जरूरत का सामान खरीदा जाएगा। साथ ही कुछ उपहार भी लिए जाएंगे और भविष्य के लिए धनराशि सुरक्षित रखी जाएगी। दीपावली पर जब घरों में मिट्टी के दीये जलेंगे, तो उनकी रोशनी में नारायणपुर के इस प्रजापति परिवार की मेहनत, परंपरा और पुश्तैनी हुनर भी झलकेगा।
