अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक ऐसा युद्ध छेड़ा है, जिसमें बारूद तो बेतहाशा खर्च हो रहा है. लेकिन हासिल कुछ नहीं हो रहा है. अमेरिका अब तक युद्ध में खबरों डॉलर खर्च कर चुका है, लेकिन वो मकसद अब तक पूरा नहीं कर पाया, जो युद्ध छेड़ने का मुख्य कारण था. ईरान का मिसाइल प्रोग्राम और यूरेनियम अब भी ईरान के अंडरग्राउंड ठिकानों में महफूज है. उल्टा इसकी मात्रा बढ़ती जा रही है. जिसका प्रमाण हैं, अमेरिका के मित्र देशों तक पहुंच रहे ईरान के मिसाइल, आखिर ये हो कैसे रहा है? अमेरिका इस युद्ध में पिछड़ क्यों रहा है?
महीनों की लगातार बमबारी, अरबों डॉलर के प्रिसिशन हथियार और स्टेल्थ विमान, फिर भी अमेरिका ईरान की मिसाइल क्षमता की खरोंच तक नहीं पहुंचा पाया. जिन अंडरग्राउंड ठिकानों को अमेरिका ने तबाह करने का दावा किया था, ईरान ने उन्हें चंद हफ्तों में फिर से ज़िंदा कर दिया है. नतीजा ये रहा कि संपूर्ण अरब पर ईरान ने मिसाइल ग्रहण लगा दिया है.
अमेरिकी बेस का दहन!
जॉर्डन से लेकर कुवैत और इराक तक, अमेरिका के हर सैन्य बेस पर ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें और घातक ड्रोन कहर बनकर टूट रहे हैं. ट्रंप जिसे छोटी झड़प बताकर अपने वोटरों को गुमराह कर रहे हैं, वो असलियत में अरब में अमेरिकी प्रभुत्व का अंत है. आखिर कैसे फेल हुआ ट्रंप का ऑपरेशन?
ईरान के अंडरग्राउंड ठिकाने
अमेरिका की नाकामी का पहला सिरा है, बॉम्बर्स की नाकामी. ट्रंप ने सोचा था कि, संपूर्ण ईरान बारूदी जलजले में दफन हो जाएगा. इसलिए इजराइल के इनपुट पर अमेरिका ने सबसे महंगे हथियारों का इस्तेमाल किया. लेकिन दांव उलटा पड़ गया.
ये ईरानी इंजीनियरिंग चमत्कार ही है कि, अमेरिका ने करमनशाह में भारी बमबारी की लेकिन ईरान ने चंद हफ्तों में ही मलबा साफ कर दिया और भूमिगत ढांचे को फिर से चालू कर दिया गया. यही नहीं ईरान की कमांड को भी अमेरिका खत्म नहीं कर सका इसलिए ईरान का गाइडेंस और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम आज भी 100 प्रतिशत काम कर रहा है.
दोगुनी तेजी से सुरंगों को बना रहा ईरान
CIA का दावा तो ये भी है कि, अमेरिका सुरंगों के दरवाजे जिस गति से तोड़ रहा है, उसकी दोगुनी तेजी से ईरान ने उन्हें खड़ा कर रहा है. यानी अमेरिका एक-एक प्रिसिशन बम पर करोड़ों डॉलर फूंक रहा है, और ईरान अपनी सस्ती तकनीक से न सिर्फ अपने अहम ठिकाने बचा रहा है, बल्कि सस्ती मिसाइल और ड्रोन से अमेरिका को अरबों का नुकसान भी पहुंचा रहा है. जिसका सबूत जॉर्डन के अमेरिकी बेस पर हुआ हमला. जो बताता है कि, ईरान की न तो मारक क्षमता कम है, न ही उसके पास हथियारों की कमी है. लेकिन ट्रंप इसे अपने देश में कैसे पेश कर रहे हैं?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि मैं इसे एक झड़प कहता हूं. ईरान के साथ हमारी एक झड़प हुई है, उन्हें इतनी ज़ोरदार चोट पहुंची है कि वो समझौता करना चाहते हैं. ट्रंप ने कहा कि मैं ये भी कहना चाहता हूं कि वो अभी समझौते के लिए तैयार नहीं हैं, जल्द ही तैयार हो जाएंगे. बयान अजीब है… शायद यही ट्रंप की झेंप है. जिसमें उनके भाव उनके बयान चेहरे से मेल नहीं खा रहे हैं. और ऐसा सिर्फ इसलिए, क्योंकि ईरान की ताकत का अंदाज़ा अब अमेरिकी सेना को भी हो चुका है.
क्या है ईरान की ताकत?
ईरान की असली ताकत है, उसका मिसाइल भंडार, जिसमें शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल अहम भूमिका निभा रही हैं, इनकी रेंज 150 किलोमीटर से 1000 किलोमीटर है. इनमें फतेह-110, फतेह-313, जुल्फेकार, देजफुल और कियाम मिसाइल शामिल हैं.
इनके अलावा ईरान मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का भी इस्तेमाल कर रहा है. जिनकी रेंज 1100 किलोमीटर से 2000 किलोमीटर तक है. इसमें शहाब-3, गद्र-110, एमाद, खैबर शिकन और हज कासिम मिसाइलें शामिल हैं.
हैरानी की बात ये है कि, इन मिसाइलों का भंडार खत्म भी नहीं हो रहा है, और ईरान इंटर मीडिएट रेंज की बैलिस्टिक मिसाइलें इस्तेमाल करने लगा. 2000 से 2500 किलोमीटर की दूरी के लिए ईरान सेजिल और खुर्रमशहर मिसाइल इस्तेमाल कर रहा है.
हाइपरसोनिक मिसाइल फतेह को लॉन्च के लिए तैयार
इनके अलावा हाइपरसोनिक मिसाइल फतेह को लॉन्च के लिए तैयार रखा गया है, और फतेह-2 के नाम से इसका उन्नत संस्करण बनाने का दावा भी कर दिया गया है. ऐसे ही 1200 से 2000 किलोमीटर की रेंज वाली क्रूज़ मिसाइल भी ईरान ने तैयार रखी है. जिसमें सौमार, होवेजेह और पावेह मिसाइलें साइलो में एक्टिवेट हैं. इनके अलावा 100 से 1000 किलोमीटर की रेंज वाली एंटी-शिप मिसाइल नूर, कादिर, गदीर और अबू महदी भी ईरान इस्तेमाल कर रहा है.
टूटा नहीं मजबूत हुआ ईरान!
ट्रंप का दावा था कि, ईरान टूट चुका है, लेकिन हकीकत कुछ और ही दिख रही है. ईरान ने अपनी ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया कि, पेंटागन में खलबली मच गई.
ईरान से सरकारी टीवी ने अंडरग्राउंड गोदामों का वीडियो जारी किया. ऐसा वीडियो, जिसमें गोदाम के अंदर अराश ड्रोन भरे हुए दिख रहे हैं. ये वही अराश ड्रोन है, जिसे दुनिया का सबसे लम्बी रेंज वाला आत्मघाती ड्रोन माना जाता है. जिसमें संदेश भी लिखा है कि, अमेरिका के अड्डे इन ड्रोन के खौफ से दहलते रहेंगे. और इस खौफ का ताज़ा सबूत, बीती रात कुवैत, इराक और जॉर्डन पर हुए हमले हैं.
यही नहीं ईरान की ताकत का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि, ट्रंप ने ईरान के बुनियादी ढांचे को तबाह करने की धमकी दी. ईरान ने अरब का तेल, गैस और आर्थिक इन्फ्रास्ट्रक्चर राख कर दिया. अब सवाल ये है कि, आखिर ईरान की रणनीति क्या है? और टारगेट क्या फिक्स गए हैं?
जवाबी कार्रवाई के लिए तीन श्रेणियां तय
अमेरिका के हमले के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई के लिए तीन श्रेणियां तय की हैं. इन श्रेणियों अलग-अलग देशों को अलग-अलग टारगेट के रूप में चुना है. पहली श्रेणी में ईरान ने इजराइल, बहरीन और कतर को रखा है क्योंकि इन्हीं देशों में अमेरिका के मुख्य सैन्य बेस हैं. दूसरी श्रेणी में ईरान ने उन देशों को शामिल किया है जो जहां अमेरिका का व्यापारिक हित है. इनमें ईरान ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत को शामिल किया है. तीसरी श्रेणी में ईरान ने उन देशों को हमले के लिए चुना है, जहां ईरान के प्रॉक्सी भी सक्रिय हैं. इनमें इराक, सीरिया और जॉर्डन प्रमुख हैं.
ईरान का मिशन, संपूर्ण अरब में रण
ईरान के हमलों के बाद अरब में दहशत का माहौल है. कुवैत की सेना ने दावा किया है कि उनका एयर डिफेंस सिस्टम ईरानी ड्रोन हमलों को रोकने की कोशिश कर रहा है, लेकिन कुवैत में भारी नुकसान की सैटेलाइट तस्वीरें सामने आ रही हैं. इस महाविनाश के बीच, अमेरिका ने ईरान पर एक बार फिर हताशा भरा जवाबी प्रहार किया है.
बुशहर न्यूक्लियर प्लांट को टारगेट बनाकर हमला
अमेरिका ने फिर बुशहर न्यूक्लियर प्लांट को टारगेट बनाकर हमला किया लेकिन इस हमले में प्लांट को नुकसान नहीं पहुंचा. सिर्फ प्लांट के पास एक बिजली स्टेशन नष्ट हो गया. खुजेस्तान के रामशीर के पास भी अमेरिका ने एक भंडारण डिपो पर हमला किया. इसके अलावा अहवाज़ और सिरिक पर भी धमाके किए. जबकि समुद्री मोर्चे पर अमेरिकी नौसेना ने ईरान से जुड़े 9 कमर्शियल जहाज़ों को दूसरी दिशा में मोड़ दिया.
लेकिन सवाल अब भी यही है कि, क्या अमेरिका के हमले ईरान को रोक पा रहे हैं? जवाब है… नहीं! अमेरिका जितना ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला कर रहा है, वह उतनी ही तेजा से कुवैत और जॉर्डन में अमेरिका के सैन्य अड्डों को श्मशान बना रहा है.
यानी अमेरिका इस समय ईरान के खिलाफ युद्ध तो लड़ रहा है, लेकिन जीत नहीं पा रहा. ट्रंप भले ही ये दावा कर रहे हैं कि, ईरान की सैन्य ताकत खत्म हो चुकी है, लेकिन ज़मीन पर ये दावा खोखला साबित हो रहा है. अमेरिका के महंगे हथियार ईरान के पहड़ों से टकराकर टूट रहे हैं. और ईरान का सस्ता बारूद पूरे अरब में अमेरिकी ठिकाने जला रहा है.
