काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है अछूत वाद्ययंत्र हारमोनियम का सफर

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आकाशवाणी (All India Radio) और दूरदर्शन में हारमोनियम का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। यह जानकर आपको हैरानी हो सकती है कि इसे एक समय पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए “अनुपयुक्त” मानकर पूरी तरह प्रतिबंधित (Ban) कर दिया गया था।
​यहाँ इसका संक्षिप्त इतिहास दिया गया है:
​1. शुरुआती दौर और प्रतिबंध (1940)
​ऑल इंडिया रेडियो पर 1 मार्च 1940 को हारमोनियम बजाने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई थी। इसके पीछे मुख्य कारण उस समय के सूचना और प्रसारण विभाग के नियंत्रक लायनेल फील्डन (Lionel Fielden) थे।
​तर्क: संगीत विशेषज्ञों का मानना था कि हारमोनियम ‘इक्वली टेम्पर्ड स्केल’ (Equally Tempered Scale) पर आधारित है, जिससे भारतीय शास्त्रीय संगीत के सूक्ष्म सुरों (श्रुतियों) और मींड़ को सही तरह से नहीं निकाला जा सकता।
​असर: करीब तीन दशकों तक रेडियो पर हारमोनियम एक “अछूत” वाद्य यंत्र बना रहा।
​2. प्रतिबंध में ढील (1971)
​दशकों के विरोध और संगीतकारों की मांग के बाद, 1971 में आकाशवाणी ने इस प्रतिबंध को थोड़ा नरम किया।
​इसे ‘एकाकी वाद्य’ (Solo Instrument) के रूप में नहीं, बल्कि केवल संगति (Accompaniment) के लिए अनुमति दी गई।
​सिर्फ उन्हीं कलाकारों को अनुमति मिली जिन्हें आकाशवाणी ने ‘ए-ग्रेड’ या उससे ऊपर की श्रेणी में रखा था।
​3. पूर्ण वापसी और वर्तमान स्थिति
​धीरे-धीरे तकनीकी सुधारों और हारमोनियम की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया।
​आज आकाशवाणी और दूरदर्शन दोनों पर हारमोनियम न केवल गायन के साथ संगत के लिए, बल्कि स्वतंत्र वादन (Solo Recital) के लिए भी एक प्रतिष्ठित वाद्य यंत्र है।
​पं. आर.के. बिजापुरे और पं. तुलसीदास बोरकर जैसे दिग्गजों ने इसकी गरिमा को शास्त्रीय मंचों पर स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
​एक रोचक तथ्य: जिस समय रेडियो पर हारमोनियम बैन था, उसी दौर में महान कलाकार बेगम अख्तर जैसी हस्तियों ने इसके समर्थन में आवाज उठाई थी, क्योंकि वे अपनी गायकी के साथ हारमोनियम की गूँज को बहुत पसंद करती थीं।