हार को जीत मानने की कला

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(www.arya-tv.com) अमेरिका में नये राष्ट्रपति की घोषणा होते ही हमारे बैचेन चच्चा मोहल्ले भर में बधाइयां देते नहीं थक रहे हैं। प्राय: नुक्कड़ पर हथेली में तंबाकू मसलते हुए राष्ट्रीय विषयों पर थिंक टैंक की भूमिका निभाने वाली मंडली पहली दफा अंतर्राष्ट्रीय विषय पर बतियाते पाई गई थी। हड़बड़े ताऊ ने ट्रम्पवा की जीत का जो दावा किया था, इसके लिए बाकायदा बेचैन चच्चा से 2 किलो प्याज की शर्त भी लगाई थी।

वहां अमेरिका में तो नतीजे घोषित होने में कई दिन लग गए। यहां बिहार में भी अमेरिकी प्रभावों का असर देखा गया। दिन भर की माथापच्ची के बाद देर रात तक परिणामों की घोषणा होने से न्यूज एंकरों ने राहत की सांस ली। अमेरिका का लोकतंत्र हमारे लोकतंत्र से इतना पीछे है कि हमारे यहां बिहार के मुख्यमंत्री को इच्छा न होने के बाद भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी पड़ती है। जबकि वहां के राष्ट्रपति को चुनाव हारने पर भी पद पर बने रहने की इच्छा रहती है। ट्रम्प बाबू हैं कि हार को हार मानने का नाम नहीं ले रहे हैं। कुर्सी हर देश में कुर्सी ही होती है।

हम अमेरिका वाली दूर की भुआ से वीडियो कॉल पर जब भी पूछते–भुआजी का हो रहा है  उनका जवाब होता-चुनाव हो रहा है। अजी! वहां का चुनाव, चुनाव न हुआ हमारे यहां का सड़क निर्माण हो गया, जो होता ही जा रहा है। भैया जितने समय तक अमेरिका में चुनाव होते हैं, इतने समय में तो हमारे नेता दल बदल कर उपचुनावों की सेटिंग में लग जाते है। लोकतंत्र में वहां रिसॉर्ट की भूमिका का कोई स्थान ही नहीं है। खुद के इतने रिसॉर्ट होने के बावजूद ट्रम्प बाबू चिल्ल-पौं करते देखे जा रहे हैं। अरे! हमारे इधर तो दूसरों के रिसॉर्ट में तीसरे की सरकार कब बन जाती है, भनक तक नहीं लगती।

वैसे हर बार हम पश्चिम के देशों का अनुसरण करते थे। इस दफा उन्होंने हमारा अनुसरण किया है। चुनाव बाद हारने वाले प्रत्याशी द्वारा लगाए जा रहे धांधली के आरोप हमारे पराजित नेताओं के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं हैं। हार के बाद धांधली हमारे यहां ही नहीं होती, हारने वाले के अनुसार अब से वहां भी होती है।

अब हमने बेस्ट फ्रेंड वाले व्हाट्सएप ग्रुप में ट्रम्पवा को रिमूव करके बाइडेन भाईजी को ऐड कर लिया है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में फ्रेंडशिप डे सरकार बदलने के दिन आता है। वैसे पाकिस्तान की विदेश नीति एक दम स्पष्ट है, राष्ट्रपति ‘जो’ भी बने, उन्हें तो बस उससे कर्ज ही मांगना है। बस एक रूस ही हमसे न सीख पाया, वहां के राष्ट्रपति अपनी गर्लफ्रेंड के कहने पर इस्तीफा देंगे, ऐसी खबरें आ रही हैं। ‘जो’ भी हो पर अमेरिका के लोग कह रहे हैं कि ट्रम्पवा का ‘जो’ हुआ, अच्छा हुआ, अमेरिका का ‘जो’ होगा, अच्छा ही होगा।

सौरभ जैन

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