- लखनऊ में 15 हजार से अधिक भंडारे, 3 करोड़ श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया प्रसाद
लखनऊ। ज्येष्ठ मास के आठ बड़े मंगल और ‘मंगल महोत्सव 2026’ इस वर्ष केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, सुशासन और जनसहभागिता का अनूठा उदाहरण बनकर सामने आए। मंगलमान संस्था द्वारा आयोजित प्रेसवार्ता में बताया गया कि इस बार पूरे लखनऊ में 15 हजार से अधिक भंडारों का आयोजन हुआ, जिसमें 3 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
विश्व संवाद केन्द्र में आयोजित प्रेसवार्ता को वाटर वुमन शिप्रा पाठक और प्रशान्त भाटिया ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि ‘स्वच्छ और हरित भंडारा’ अभियान ने पारंपरिक धार्मिक आयोजनों को पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सामाजिक सहभागिता से जोड़ने का सफल प्रयास किया है।
- 150 करोड़ से अधिक का आर्थिक प्रभाव, लाखों को मिला रोजगार
प्रशान्त भाटिया ने बताया कि बड़े मंगल के आयोजनों का आर्थिक प्रभाव 150 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया है। बिना किसी सरकारी बजटीय सहायता के समाज के सहयोग से हुए इन आयोजनों ने स्थानीय हलवाइयों, टेंट व्यवसायियों, परिवहन सेवाओं, फूल विक्रेताओं और दिहाड़ी मजदूरों को व्यापक रोजगार उपलब्ध कराया। अनुमान के अनुसार इस दौरान लगभग डेढ़ लाख मानव श्रम दिवसों का सृजन हुआ।
- एक लाख पौधों का वितरण, 550 भंडारे रहे प्लास्टिक मुक्त
शिप्रा पाठक ने बताया कि इस वर्ष बड़े मंगल का सबसे उल्लेखनीय पहलू पर्यावरण संरक्षण रहा। आयोजन के दौरान 8 लाख हरित दोने, 4 लाख हरित पत्तल, 1 लाख लकड़ी के चम्मच तथा 1 लाख पौधों का वितरण किया गया। मंगलमान शोध संस्थान के अनुसार 550 से अधिक भंडारे पूरी तरह प्लास्टिक और थर्माकोल मुक्त रहे।
प्रयागराज महाकुंभ की तर्ज पर कई स्थानों पर ‘बर्तन बैंक’ स्थापित किए गए, जहां स्टील के बर्तनों का उपयोग किया गया। इसके साथ ही बेसहारा पशुओं के लिए विशेष ‘पशु भंडारे’ भी आयोजित किए गए।
- बड़े मंगल में दिखी सामाजिक समरसता की मिसाल
प्रशान्त भाटिया ने बताया कि बड़े मंगल के आयोजनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ के पांच संकल्पों की झलक स्पष्ट दिखाई दी। श्रद्धालुओं ने अनुशासन के साथ कतारबद्ध होकर प्रसाद ग्रहण किया और आयोजन के बाद स्वच्छता अभियान में भी भागीदारी निभाई।
उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता का अद्भुत दृश्य तब देखने को मिला जब जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति के भेदभाव से ऊपर उठकर सभी लोगों ने एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। झुग्गी-झोपड़ियों और निर्धन बस्तियों में विशेष भंडारों के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने का प्रयास किया गया।
- संकट के बीच आत्मनिर्भरता का संदेश
प्रशान्त भाटिया ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और एलपीजी गैस आपूर्ति पर पड़ रहे प्रभाव के बावजूद कई आयोजनों में बायोमास आधारित पर्यावरण अनुकूल चूल्हों का उपयोग किया गया। इससे स्थानीय संसाधनों के उपयोग और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला तथा भंडारों की परंपरा निर्बाध रूप से जारी रही।
- विशिष्टजनों ने किया निरीक्षण, शोध के लिए हुआ सर्वेक्षण
इस महाअभियान का निरीक्षण करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल, प्रांत प्रचारक कौशल, पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल आर्या तथा सह संयोजक राकेश जैन सहित कई प्रमुख व्यक्तित्व विभिन्न भंडारों में पहुंचे।
वहीं आयोजन के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करने के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. उदय प्रताप सिंह के निर्देशन में 45 छात्र-छात्राओं की टीम ने आठ समूहों में व्यापक सर्वेक्षण किया। यह अध्ययन भविष्य में शोध और सामाजिक विश्लेषण के लिए उपयोगी माना जा रहा है।
- 700 से अधिक स्वयंसेवकों ने निभाई सक्रिय भूमिका
इस अभियान को सफल बनाने में पंचतत्व फाउंडेशन, अखंड हिन्द फौज, लोक भारती, प्रकृति भारती, स्टूडेंट्स फॉर डेवलपमेंट, मां जानकी सेवा संस्थान, राष्ट्रीय सेवा योजना और भारत स्काउट एवं गाइड सहित अनेक संगठनों के 700 से अधिक स्वयंसेवकों ने सक्रिय योगदान दिया।
लखनऊ नगर निगम ने स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की, जबकि लखनऊ विकास प्राधिकरण ने आरडब्ल्यूए के माध्यम से जनजागरूकता अभियान चलाया।
- उत्कृष्ट भंडारों को मिलेगा सम्मान
आयोजकों ने बताया कि जिन भंडारों में नवाचार, स्वच्छता, बेहतर प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की अनुकरणीय व्यवस्था की गई, उन्हें जिलाधिकारी लखनऊ द्वारा सम्मानित किया जाएगा। साथ ही भविष्य में इस आयोजन को पूरी तरह डिजिटल और ‘प्लग एंड प्ले’ सुविधाओं से जोड़कर राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर एक आदर्श मॉडल के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
