नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार सुबह संस्कृत सुभाषितम् साझा करते हुए मनुष्य की श्रद्धा, सोच और आचरण के बीच संबंध को रेखांकित किया। श्रीमद्भगवद्गीता के एक श्लोक के माध्यम से उन्होंने बताया कि व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुरूप होती है और उसका व्यक्तित्व भी उसी के अनुसार आकार लेता है। प्रधानमंत्री ने यह श्लोक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किया।
पीएम मोदी ने लिखा, “सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥” यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17, जिसे श्रद्धात्रयविभागयोग कहा जाता है, के तीसरे श्लोक से लिया गया है।
इसका भावार्थ है कि प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण और स्वभाव के अनुरूप होती है। मनुष्य जिस प्रकार की श्रद्धा रखता है, उसका व्यक्तित्व भी वैसा ही बनता जाता है। उसकी सोच, विश्वास और आचरण पर उसकी आंतरिक मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है।
गीता के श्लोक में छिपा है जीवन का संदेश, जैसी श्रद्धा वैसा आचरण
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक श्रद्धा के महत्व को समझाता है। इसके अनुसार, किसी व्यक्ति की मान्यताएं और विश्वास उसके व्यवहार तथा जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं। मनुष्य जिस विचारधारा और आस्था को अपनाता है, उसका असर उसके फैसलों और आचरण में भी दिखाई देता है।
भगवान श्रीकृष्ण इस प्रसंग में श्रद्धा की प्रकृति को मनुष्य के स्वभाव से जोड़कर समझाते हैं। संदेश यह है कि व्यक्ति के भीतर मौजूद गुण और उसकी आंतरिक प्रवृत्तियां उसकी श्रद्धा को प्रभावित करती हैं। इसी आधार पर उसके व्यवहार और व्यक्तित्व का स्वरूप सामने आता है।
अर्जुन के सवाल पर श्रीकृष्ण ने समझाया श्रद्धा का महत्व
गीता के 17वें अध्याय में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जो लोग शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन किए बिना अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं, उनकी निष्ठा किस प्रकार की मानी जाती है- सात्त्विक, राजसी या तामसी?
अर्जुन के इसी प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण श्रद्धा के विभिन्न स्वरूपों की व्याख्या करते हैं। वह बताते हैं कि सभी मनुष्यों की श्रद्धा एक जैसी नहीं होती, बल्कि उसका स्वरूप उनके स्वभाव और अंतःकरण के गुणों के अनुसार अलग-अलग होता है। इस तरह गीता का यह श्लोक व्यक्ति के आंतरिक गुणों, उसकी आस्था और उसके आचरण के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।
एक दिन पहले पीएम मोदी ने प्रकृति संरक्षण पर साझा किया था सुभाषितम्
इससे पहले बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संस्कृत सुभाषितम् साझा करते हुए प्रकृति के संरक्षण और उसके कल्याण का संदेश दिया था। उन्होंने लिखा था—
“पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा। प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥”
इसका भावार्थ है कि जो शासक प्रकृति की रक्षा करता है और उसके कल्याण के लिए काम करता है, उसे सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। प्रकृति की देखभाल करने और उसे सुरक्षित रखने से समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
इस सुभाषितम् के जरिए प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और उसके संरक्षण के महत्व को रेखांकित किया गया। बुधवार के संदेश में जहां प्रकृति की रक्षा पर जोर था, वहीं गुरुवार को साझा किए गए श्लोक में श्रद्धा, विचार और व्यक्ति के आचरण के संबंध को प्रमुखता दी गई। प्रधानमंत्री की इन पोस्ट में संस्कृत के प्राचीन ज्ञान और उसके संदेशों को वर्तमान जीवन से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
