लखनऊ पुलिस श्रद्धा दुबे पर हुई मेहरबान, 6 घंटे पूछताछ, बोलीं- वकील से बात करिए, फिर भी कस्टडी रिमांड नहीं मांगी; 10 दिन के लिए जेल भेजकर आरोपियों को बच निकलने का आसान रास्ता मिला?
श्रद्धा दुबे केस में लखनऊ पुलिस की जांच पर गंभीर सवालों के घेरे में है, क्या आरोपियों को मिला बच निकलने का आसान रास्ता? पहले लखनऊ पुलिस श्रद्धा दुबे को गिरफ्तार नहीं कर पाई, जिसकी बजह से 3 अफसरों पर कार्यवाही भी हुई, जैसे तैसे गिरफ्तार हुई, न कस्टडी रिमांड मांगी, न क्राइम सीन रीक्रिएशन कराया! मौत की गुत्थी सुलझाने के बजाय आरोपियों की ट्रैवल हिस्ट्री में उलझी पुलिस?
जब मौत की वजह ही सवालों के घेरे में है, तो पुलिस ने आरोपियों की रिमांड क्यों नहीं मांगी? जब घटनास्थल की परिस्थितियां सवाल खड़े कर रही हैं, तो क्राइम सीन रीक्रिएशन क्यों नहीं हुआ? और जब हत्या की आशंका की जांच जरूरी है, तो पुलिस आरोपियों की यात्रा का रास्ता तलाशने में ही क्यों उलझी रही?”
क्या पुलिस के पास पर्याप्त साक्ष्य पहले से मौजूद हैं, या जांच के महत्वपूर्ण अवसर हाथ से निकल रहे हैं?
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पुलिस ने आरोपियों के मोबाइल फोन, चैट, कॉल रिकॉर्ड, कथित आपत्तिजनक वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच किस स्तर तक पूरी की है। क्या इनका फॉरेंसिक परीक्षण कराया गया? क्या घटनास्थल से मिले साक्ष्यों का पोस्टमार्टम निष्कर्षों से मिलान हुआ?
अब सबसे बड़ा सवाल लखनऊ पुलिस की निष्पक्षता और जांच की दिशा को लेकर उठ रहा है।
क्या पुलिस ने श्रद्धा दुबे और अन्य आरोपियों से उन सवालों पर पर्याप्त पूछताछ की, जिनसे मौत की असली वजह सामने आ सकती थी? या फिर विवेचना में ऐसी चूक हुई जिसका फायदा बचाव पक्ष को मिल सकता है?
ऐसे ना जाने कितने गंभीर सवालों के घेरे में है लखनऊ पुलिस.
