भाई ने छोड़ा अपना सपना, पिता ने की मजदूरी… फिर राजा मुथुपांडी ने CWG 2026 में रचा इतिहास

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नई दिल्ली: कुछ कहानियां सिर्फ जीत और हार तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उन संघर्षों की मिसाल बन जाती हैं जो लाखों लोगों को प्रेरणा देती हैं। भारतीय भारोत्तोलक राजा मुथुपांडी की कहानी भी ऐसी ही है। तमिलनाडु के एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्रमंडल खेल 2026 के पोडियम तक पहुंचने वाले राजा ने सिर्फ रजत पदक नहीं जीता, बल्कि यह भी साबित किया कि कठिन परिस्थितियां बड़े सपनों के आगे टिक नहीं सकतीं।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में जीता रजत पदक

ग्लास्गो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 की पुरुष 65 किलोग्राम भारोत्तोलन स्पर्धा में राजा मुथुपांडी ने शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 126 किलोग्राम स्नैच और 160 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क के साथ कुल 286 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया।

इस मुकाबले में मलेशिया के मुहम्मद अजनिल बिन बिदिन ने 299 किलोग्राम के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि पापुआ न्यू गिनी के मोरिया बारू ने 282 किलोग्राम वजन उठाकर कांस्य पदक हासिल किया।

माचिस फैक्ट्री में मजदूरी करने वाले पिता के बेटे हैं राजा

12 जनवरी 2000 को तमिलनाडु के कोविलपट्टी में जन्मे राजा मुथुपांडी का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। उनके पिता माचिस फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं, जबकि मां एक मिठाई की दुकान में सफाई का काम करती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी और कई बार दो वक्त का भोजन जुटाना भी चुनौती बन जाता था।

भाई ने छोड़ा खेल, राजा ने पूरा किया सपना

राजा के बड़े भाई ने सबसे पहले भारोत्तोलन की शुरुआत की थी। राजा भी उनके साथ अभ्यास करने लगे। लेकिन घर की आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण बड़े भाई को अपना खेल छोड़ना पड़ा।

भाई ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और अपने सपनों का त्याग किया, जबकि राजा ने उसी सपने को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

18 साल में मिली पहचान, फिर चोटों ने बढ़ाई मुश्किलें

राजा की प्रतिभा जल्द सामने आ गई। वर्ष 2017 में उन्होंने कॉमनवेल्थ यूथ और जूनियर चैंपियनशिप में पदक जीतकर अपनी पहचान बनाई। इसके बाद 2018 गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और छठे स्थान पर रहे।

हालांकि इसके बाद उनके करियर में मुश्किलों का लंबा दौर शुरू हुआ। वर्ष 2019 से 2025 के बीच उन्हें तीन बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ा। पहले बाएं हाथ की कोहनी के लिगामेंट में चोट लगी, फिर अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ। इसी दौरान उन्हें दो बार डेंगू और एक बार पीलिया भी हुआ। वापसी के दौरान राष्ट्रीय चैंपियनशिप में बाएं घुटने का लिगामेंट फट गया, जिसके बाद एक और ऑपरेशन कराना पड़ा।

एक समय खेल छोड़ने का भी बना मन

लगातार चोटों, आर्थिक परेशानियों और लंबे पुनर्वास के चलते राजा मानसिक रूप से भी काफी परेशान हो गए थे। भारतीय रेलवे में नौकरी मिलने के बाद उन्होंने खेल छोड़कर नया करियर बनाने का फैसला भी कर लिया था।

इसी उद्देश्य से वह भुवनेश्वर में स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग का कोर्स करने पहुंचे, लेकिन वहां खिलाड़ियों को अभ्यास करते देखकर उनके भीतर का खिलाड़ी फिर जाग गया। कोच और साथियों के प्रोत्साहन ने उन्हें दोबारा भारोत्तोलन की दुनिया में लौटने के लिए प्रेरित किया।

कोच विजय शर्मा की देखरेख में शानदार वापसी

राष्ट्रीय कोच विजय शर्मा के मार्गदर्शन में राजा ने अपने करियर की नई शुरुआत की। उन्होंने 2025 कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर दमदार वापसी की।

इसके बाद विश्व चैंपियनशिप में नौवां स्थान हासिल किया। फरवरी 2026 में सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में 302 किलोग्राम कुल वजन उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया और कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए अपनी जगह पक्की की।

ग्लास्गो में पूरा हुआ वर्षों का सपना

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में राजा मुथुपांडी ने अपने करियर का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक जीतते हुए देश को गौरवान्वित किया।

पदक जीतने के बाद उन्होंने भावुक होकर कहा कि यह सफलता उनके माता-पिता और कोच विजय शर्मा को समर्पित है। उनके अनुसार, परिवार ने अपनी जरूरतों का त्याग कर उनके सपनों को जिंदा रखा और कोच ने हर कठिन समय में उनका विश्वास बनाए रखा।

राजा मुथुपांडी की कहानी सिर्फ एक रजत पदक तक सीमित नहीं है। यह संघर्ष, परिवार के त्याग, आत्मविश्वास और लगातार मेहनत की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी।