- “अंक नहीं, मानसिक संतुलन भी जरूरी — युवाओं के लिए संवेदनशील व्यवस्था बने : डॉ. राजेश्वर सिंह”
- “हर दिन 40 छात्रों की आत्महत्या चिंता का विषय, समाज को बदलनी होगी सफलता की परिभाषा : डॉ. राजेश्वर सिंह”
सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताज़ा आंकड़ों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2024 में देश में 14,488 students द्वारा आत्महत्या किया जाना केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन लगभग 40 युवा जीवन से हार मान रहे हैं, जो समाज, शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक संरचना के सामने बड़े प्रश्न खड़े करता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षणिक और सभ्यतागत संकट का संकेत है। आज पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और तीव्र प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है, जहाँ सामाजिक माध्यमों ने तुलना और दबाव को लगातार बढ़ा दिया है। असफलता का भय, अकेलापन, मानसिक तनाव, इंटरनेट पर उत्पीड़न और अवास्तविक अपेक्षाएँ युवाओं को भीतर से कमजोर कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि असफलताएँ जीवन का अंत नहीं होतीं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था — “सफलता अंतिम नहीं होती, असफलता घातक नहीं होती; आगे बढ़ते रहने का साहस ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।”
इसी प्रकार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने जीवन में अनेक चुनावी असफलताओं का सामना किया, लेकिन संघर्ष और धैर्य के बल पर वे विश्व इतिहास के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुए। डॉ. सिंह ने कहा कि महानता का मार्ग कभी सीधा नहीं होता और कठिन समय ही व्यक्ति को मजबूत बनाता है।
उन्होंने कहा कि जापान, दक्षिण कोरिया, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और फ़िनलैंड जैसे देशों ने समय रहते युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और संतुलित शिक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। भारत को भी केवल अंकों पर आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर रचनात्मकता, भावनात्मक संतुलन, जीवन कौशल और व्यक्तित्व विकास आधारित शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी।
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि समाज को सफलता की परिभाषा केवल अंक, वेतन और विदेश में प्रवेश तक सीमित नहीं करनी चाहिए। हर बच्चे की प्रतिभा अलग होती है और प्रत्येक युवा को तुलना और अपमान नहीं, बल्कि सम्मान, प्रोत्साहन और अवसर की आवश्यकता है।
उन्होंने माता-पिता से अपील करते हुए कहा कि बच्चों को केवल प्रदर्शन का दबाव नहीं, भावनात्मक सुरक्षा भी चाहिए। कई बार एक संवाद, एक भरोसा और सहयोगपूर्ण वातावरण किसी बच्चे को टूटने से बचा सकता है। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि परिवार उनसे केवल सफलता के लिए नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व के लिए प्रेम करता है।
डॉ. सिंह ने शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि चरित्र, आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता का निर्माण भी होना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में परामर्श व्यवस्था, मार्गदर्शन कार्यक्रम, खेल, कला, वाद-विवाद, योग और ध्यान जैसी गतिविधियों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने युवाओं से कहा कि जीवन किसी एक परीक्षा, एक परिणाम या एक असफलता से कहीं बड़ा होता है। कठिन समय स्थायी नहीं होता और असफलता अंत नहीं होती। उन्होंने युवाओं से अपील की कि तनाव या निराशा की स्थिति में चुप न रहें, अपने परिवार, मित्रों या विशेषज्ञों से बात करें और जीवन के प्रति आशा बनाए रखें।
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि आने वाले वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था, नवाचार, वैज्ञानिक नेतृत्व और वैश्विक प्रभाव की दिशा यही युवा तय करेंगे। यदि युवा मानसिक रूप से सशक्त, अनुशासित और दूरदर्शी बने, तो भारत 21वीं सदी का नेतृत्व कर सकता है।
