डॉ. राजेश्वर सिंह : हर जिले में विशेषज्ञ इकाई बनाने की जरूरत-₹22,845 करोड़ तक पहुंचा साइबर धोखाधड़ी का सालाना नुकसान

Lucknow
  • डिजिटल अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए आधुनिक तकनीक, त्वरित न्याय और जनजागरूकता पर जोर

लखनऊ। सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने देश में तेजी से बदलते आर्थिक और साइबर अपराधों पर चिंता जताते हुए कानून प्रवर्तन व्यवस्था को आधुनिक बनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि अब अपराधी ताले तोड़ने के बजाय फर्जी कॉल, जाली दस्तावेजों, डिजिटल धोखाधड़ी और क्लोन की गई आवाजों के जरिए लोगों की मेहनत की कमाई को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में अपराध के बदलते स्वरूप के अनुरूप जांच, निगरानी और न्याय व्यवस्था को सक्षम बनाना जरूरी है।

  • आर्थिक अपराधों में लगातार बढ़ोतरी

डॉ. सिंह के अनुसार, आईपीसी के तहत आर्थिक अपराधों की संख्या वर्ष 2012 में लगभग 1.14 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 में 2.14 लाख हो गई। इनमें करीब 87 प्रतिशत मामले जालसाजी, धोखाधड़ी और छल से संबंधित बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि बैंक धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में वर्ष 2004-05 से 2023-24 के बीच कुल ₹5.66 लाख करोड़ की राशि शामिल रही, जबकि इसकी लगभग सात प्रतिशत राशि ही वसूल हो सकी।

  • साइबर धोखाधड़ी से आम नागरिकों की बचत पर खतरा

विधायक ने बताया कि नागरिकों द्वारा दर्ज साइबर धोखाधड़ी से संबंधित नुकसान वर्ष 2023 के ₹7,465 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024 में ₹22,845 करोड़ तक पहुंच गया। वहीं, साइबर शिकायतों की संख्या वर्ष 2021 में 4.52 लाख से बढ़कर वर्ष 2025 में लगभग 24 लाख हो गई। उनके मुताबिक, डिजिटल धोखाधड़ी अब केवल व्यक्तिगत आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में लोगों के भरोसे के लिए भी चुनौती बन रही है।

  • कम दोषसिद्धि और लंबित मुकदमों पर चिंता

डॉ. राजेश्वर सिंह ने आर्थिक अपराधों में लगभग 29 प्रतिशत दोषसिद्धि दर और 96 प्रतिशत से अधिक मामलों के न्यायालयों में लंबित होने संबंधी आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि जांच से लेकर सुनवाई तक की प्रक्रिया प्रभावी बनानी होगी। उन्होंने जोर दिया कि अपराधियों को समयबद्ध दंड और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए विशेष न्यायालयों की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।

  • हर जिले में विशेषज्ञ साइबर एवं आर्थिक अपराध इकाई की मांग

डॉ. सिंह ने सुझाव दिया कि प्रत्येक जिले में प्रशिक्षित विशेषज्ञों, आधुनिक फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण की सुविधा से युक्त आर्थिक एवं साइबर अपराध इकाई स्थापित की जाए। साथ ही, संदिग्ध म्यूल बैंक खातों की पहचान और नियमानुसार त्वरित कार्रवाई के लिए वास्तविक समय की निगरानी व्यवस्था विकसित हो। बैंकों, फिनटेक कंपनियों और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

  • डिजिटल साक्षरता से मजबूत होगी नागरिकों की सुरक्षा

उन्होंने गांवों, वरिष्ठ नागरिकों और पहली बार यूपीआई का उपयोग करने वाले लोगों तक साइबर सुरक्षा की जानकारी पहुंचाने के लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने पर जोर दिया। फर्जी कॉल, संदिग्ध लिंक, नकली निवेश योजनाओं और डिजिटल पहचान की चोरी से बचाव को जनशिक्षा का हिस्सा बनाने की जरूरत बताई।

  • आर्थिक सुरक्षा के लिए शून्य सहिष्णुता का दृष्टिकोण जरूरी

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने और पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए आर्थिक अपराधों के प्रति शून्य सहिष्णुता का दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि तकनीक आधारित निगरानी, संस्थागत जवाबदेही, त्वरित न्याय और व्यापक जनजागरूकता के समन्वय से आर्थिक अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। नागरिकों की मेहनत की कमाई की रक्षा करना देश के आर्थिक भविष्य और जनविश्वास की रक्षा करने के समान है।