कभी अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध नैनीताल झील अब एक बार फिर अपनी खोई हुई पहचान की ओर लौटने की दिशा में आगे बढ़ रही है। झील के पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने और लुप्तप्राय शीतजल मछली प्रजातियों के पुनर्जीवन के उद्देश्य से कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर स्थित जंतु विज्ञान विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। इसके तहत स्थानीय रूप से ”असेला” के नाम से जानी जाने वाली स्नो ट्राउट मछली के संरक्षण और पुनर्स्थापन का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।
इसी क्रम में गुरुवार को नैनीताल झील में विशेष रूप से तैयार फिश केज स्थापित किया गया। इस केज में स्नो ट्राउट के शिशु (फिंगरलिंग) डाले गए हैं, जिन्हें नियंत्रित वातावरण में विकसित किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इन मछलियों का प्रजनन डीएसबी परिसर के जंतु विज्ञान विभाग की प्रयोगशाला में ही किया गया है, जो इस परियोजना की वैज्ञानिक सफलता को दर्शाता है। कार्यक्रम में कुलपति प्रो. (कर्नल) दीवान सिंह रावत ने बताया कि करीब दो दशक पहले नैनीताल झील की स्थानीय मछली प्रजातियां लगभग लुप्तप्राय हो चुकी थीं। इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय में बायोफ्लॉक मत्स्य प्रौद्योगिकी केंद्र की स्थापना की गई। विभागाध्यक्ष प्रो. एचसीएस बिष्ट और उनकी टीम के प्रयासों से इस तकनीक को सफल बनाया गया।
उन्होंने बताया कि बायोफ्लॉक और पारंपरिक तकनीकों के माध्यम से स्नो ट्राउट का सफल संवर्धन किया गया है। दो चक्रों में उत्पादन कर इन मछलियों का विक्रय भी किया गया, जिससे परियोजना की व्यवहारिकता सिद्ध हुई। अब अगले चरण में इन मछलियों को उनके प्राकृतिक आवास-नैनीताल झील में स्थापित किया जा रहा है, जहां उनके विकास और जल गुणवत्ता पर वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।
कुलपति ने कहा कि स्नो ट्राउट झील के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मछली शैवाल को नियंत्रित कर पानी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करती है, जिससे झील में बढ़ती काई की समस्या पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य संरक्षण के साथ-साथ विद्यार्थियों को आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना भी है। इस परियोजना को सफल बनाने में प्रशासन और स्थानीय निकायों का भी सहयोग मिला है। मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, नगर पालिका परिषद नैनीताल की अध्यक्ष डॉ. सरस्वती खेतवाल, अधिशासी अधिकारी रोहिताश शर्मा तथा सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई है।
विभागाध्यक्ष प्रो. एचसीएस बिष्ट ने बताया कि आगामी योजना के तहत नैनीताल जनपद की चार प्रमुख झीलों नैनीताल, भीमताल, सातताल और नौकुचियाताल में दो-दो फिश केज स्थापित किए जाएंगे। यह कार्य उत्तराखंड मत्स्य कृषक विकास अभिकरण, राज्य मत्स्य विभाग भीमताल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय के संयुक्त सहयोग से किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि इस परियोजना को कुमाऊं विश्वविद्यालय की आंतरिक अनुसंधान निधि और मुख्यमंत्री शोध प्रोत्साहन योजना से वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ है।
झील के किनारे शुरू हुई यह पहल न केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग है, बल्कि नैनीताल की प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक उम्मीद भी है जहां आने वाले समय में ‘असेला’ फिर से झील की पहचान बन सकती है। कार्यक्रम में नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. सरस्वती खेतवाल, अधिशासी अधिकारी रोहिताश शर्मा, प्रो. एचसीएस बिष्ट, प्रो. संजय घिल्डियाल, प्रो. रीतेश साह, प्रो. आशीष मेहता सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी और अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
