श्रमजीवी पत्रकारों में मेरठ में जागरण के पत्रकार राजेश अवस्थी द्वारा सल्फास खाकर आत्महत्या करने की घटना कई अहम सवाल खड़े करती है आखिर 40 -50 साल पत्रकारिता करने के बाद जब उम्र का अंतिम पड़ाव आता है तो बडेसे बड़ा पत्रकार भी असहाय हो जाता है ना तो ढंग की पेंशन मिलती है नहीं प्रोविडेंट फंड में इतना पैसा होता है की सारी समस्या का समाधान हो सके
संगठन, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन प्रेस क्लब मई दिवस और तहरी भोज का आयोजन कर इति श्री कर लेती है जिसने आत्महत्या उस साथी की बिना चिंता किए यह पूरा वर्ग उस पत्रकार को भुलाकर परिवार को बेसहाराछोड़ देता है नवजीवन दैनिक के पत्रकार चंद्रशेखर त्रिपाठी नेआर्थिक तंगी से जूझतेहुए ऐशबाग रेलवे लाइन पर आत्महत्या कर ली परिवार में विधवा लड़की ही बची लड़का छोटा था इसलिए खानेकमाने का टोटाहोने लगा श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के तमाम सदस्य चंद्रशेखर जी के साथ बरसों तक काम कर चुके थे पर किसी ने भी उनकी आवाज माननीय मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंचाई राजेश अवस्थी की आवाज भी मेरठ के बाहर नहीं आ पाएगी कोई सुगबुगाहट नहीं होगी और नहीं फौरी तौर पर कोई राहत प्रदान की जाएगी नव जीवन में कार्यरत गणेश शंकर त्रिपाठी राहुल पांडे वीरेंद्र सिंह नेगी अमर उजाला के रामनगीना और ऐसे दर्जनों पत्रकार हैं जिनके परिवार उनकी मृत्यु के पश्चात भयंकर आर्थिक तंगी से जूझ रहे है नवजीवन के ही दिलीप सिन्हा की एक्सीडेंट में हुई मृत्यु अभी कोई भूला नहीं है किंतु सरकार के कानों पर जून तक नहीं रेंगी जो पत्रकार 24 * 7 सरकारी योजनाओं पूरे मंत्रिमंडल और शीर्ष अधिकारियों की खबरों का प्रकाशन करता रहता है उसकी आवाज खामोश होते ही परिवार को छोड़कर उसके साथी यूनियन के सदस्य प्रेस क्लब के करता धर्ता सब भूल जाते हैं बिरले पत्रकार होते हैं जिन्हें शोकसभा हमेशा श्रद्धांजलि दी जाती है बाकी कोई नाम लेवा नहीं रहता
वैसे भी विभिन्न समाचार पत्रों में काम करने वाले शिफ्ट में कार्य करके अपनी नींद अपना परिवार और अपनी जिम्मेदारी दोनों की तिलांजलि देकर समाज की सेवा करते हैं पत्रकारों का अच्छा खासा वोट बैंक है किंतु उनकी सुनने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई देता
सामान्यमौत की बात छोड़ भी दे तोभी आत्महत्या का यह सिलसिला टूटा नहीं दिखाई दे रहा है कल चंद्रशेखर और आज राजेश अवस्थी .पत्रकार संगठन योगी सरकार बिखरे परिवार को सहायता देने का कार्य करेगी या समय की धूल उनके सारे क्रियाकलापों पर उनकी मेहनत उनकी डिवोशन पर धूल की एक लंबी परतचढ़ा देगी उम्र के अंतिम पड़ाव पर जो भी पत्रकार छोटे हो या बड़े खड़े हैं सब का दर्द कमोवेश एक सा है निश्चित आयहैं ना ही कोई भविष्य बड़े से बड़े पत्रकार स्ट्रिंगर का काम कर रहे हैं ढाई सौ से ₹1000 तक का पारिश्रमिक मिलता है कभी-कभी वह भी नहीं मिलता खबर देने का काम पत्रकारों का है उनके हित का सोचना मलिक और सरकारों का है बिहार सरकार ने एक नई पहल की है किंतु उत्तर प्रदेश की सरकार इस ओर से आंखें मूंदे बैठी है दिल्ली पुलिस ने ट्रैफिक में लगी अपनी फौज को एयर कंडीशन हेलमेट बैठे हैं किंतु पत्रकार आज भी अपने वाहन से कड़ी से कड़ी धूप में जाकर खबरें लाता है बड़े चैनलों के पत्रकार लंबी तनखाएं पाते हैं ईरान और इराक में युद्ध की भूमि पर जाकर खबरों का संकलन करते हैंपर मिलता क्या है क्या यही सामाजिक न्याय है धन्य है पत्रकार के नियम और यूनियन के विभिन्न पदों पर बैठे दिग्गज पत्रकार
