स्मार्ट सिटी के नाम पर किस तरह पैसे की बर्बादी हुई मालगोदाम रोड का व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स इसका जीता-जागता उदाहरण है। अफसरों की अदूरदर्शिता और बजट खपाओ नीति ने करीब चार करोड़ रुपये की लागत से ऐसी इमारत खड़ी कर दी, जो पिछले चार साल से वीरान पड़ी है। तांगा स्टैंड पर बने इस तीन मंजिला कॉम्प्लेक्स में कोई व्यापारी दुकान लेने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहा है। बताते हैं कि तत्कालीन अफसरों ने प्रोजेक्ट की ड्राइंग-डिजाइन बनाते समय व्यापार की पहली शर्त यानी पार्किंग को ही नक्शे से दरकिनार कर दिया, जिसका नतीजा यह है कि इसका कोई लाभ नहीं मिल सका।
वर्ष 2018 में जब स्मार्ट सिटी योजना लागू हुई तब अफसरों ने शहरी जनता के लिए तमाम प्रोजेक्ट बनाए। कई चरणों के बाद जिन प्रोजेक्टों को हरी झंडी मिली, इसमें व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स भी शामिल था। वर्ष 2021-22 में तांगा स्टैंड पर व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स का निर्माण शुरू हुआ था। वर्तमान में कॉम्पलेक्स बनकर तैयार है। मगर, पार्किंग की समस्या की वजह से व्यापारी इसमें दुकान लेने के लिए तैयार नहीं हैं। प्रोजेक्ट बनाने से पहले स्मार्ट सिटी के रणनीतिकारों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। जबकि बिना पार्किंग किसी भी व्यावसायिक गतिविधि की कल्पना करना बेमानी है। अफसरों ने केवल बजट खपाने और फाइलों में प्रोजेक्ट पूरा दिखाने की जल्दबाजी में इसे अंजाम दिया। अब अधिकारी कॉम्प्लेक्स के नीचे की मामूली खाली जगह को पार्किंग बताकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। हकीकत यह है कि अगर यही निर्माण किसी बिल्डर ने किया होता, तो वह पार्किंग और अन्य सुविधाओं का सटीक रोडमैप तैयार करता, जिससे निर्माण पूरा होने से पहले ही दुकानें बिक जातीं। इसके उलट, सरकारी तंत्र ने करोड़ों रुपये मिट्टी में मिला दिए।
सर्वे के बिना खपाए करोड़ों, अब हो रहे परेशान
व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बिना सर्वे वाली कार्यप्रणाली का शिकार हो गया है। अफसरों ने जमीनी हकीकत जाने बिना होटल के लिए उपयुक्त जगह पर दुकानों का निर्माण करा दिया, जिससे व्यापारी वहां निवेश करने से कतरा रहे हैं। व्यापारियों का मानना है कि आस-पास गोदामों की अधिकता और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण कोई भी यहां शोरूम खोलने का जोखिम नहीं लेना चाहता। साफ है कि अगर निर्माण से पहले बाजार की मांग और सुरक्षा का आंकलन किया गया होता, तो आज यह भवन वीरान न होता।
बिल्डरों ने भी नहीं दिखाई दिलचस्पी
व्यावसायिक भवनों के लिए अफसरों को खरीदार नहीं मिल रहे हैं। इसके लिए नगर निगम ने दो साल पहले बीडीए से सहयोग लेकर बिल्डरों के साथ बैठक भी की थी, लेकिन बिल्डरों ने भी इसे खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। अफसर चाहते हैं कि इस कॉम्प्लेक्स में एक-एक दुकान बेचने के बजाए पूरा भवन कोई बिल्डर खरीद ले और फिर उसे बेचता रहे, लेकिन भवन की जो रकम लगाई जा रही है, वह ज्यादा होने के कारण उसे लेने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।
व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स के आवंटन के लिए नगर निगम गंभीर है। पूर्व में चार बार टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। अब पांचवीं बार टेंडर निकाला गया है। उम्मीद है कि इस बार व्यापारियों की रुचि और बदली हुई शर्तों के आधार पर टेंडर प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी कर ली जाएगी, जिससे कॉम्प्लेक्स में व्यावसायिक गतिविधियां जल्द शुरू हो सकेंगी।
