(www.arya-tv.com)वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों को अधिकारियों ने अनदेखा किया
उनकी कोविड-19 टास्क फोर्स की बैठक महीनों से नहीं हुई है। उनके स्वास्थ्य मंत्री ने मार्च में जनता को आश्वस्त किया कि भारत में महामारी खत्म हो चुकी है। जनवरी के अंत में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के वर्चुअल सम्मेलन में मोदी ने कहा, भारत ने कोरोना पर प्रभावशाली तरीके से काबू करके मानवता को बड़े विनाश से बचा लिया है। अब वायरस की दूसरी लहर ने भारत को विश्व का सबसे अधिक प्रभावित देश बना दिया है। जीत की घोषणा के बाद गंभीर संकट की स्थिति ने लोगों को मोदी के संबंध में नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया है। किसी समय दुनियाभर में विशेषज्ञ महामारी के भीषण प्रकोप से बचने के लिए भारत की प्रशंसा करते थे। अब भी मोदी के समर्थक कहते हैं कि भारत वैश्विक आपदा का शिकार हुआ है और दूसरी लहर के कारण जानने के लिए अधिक समय की जरूरत है। लेकिन, स्वतंत्र स्वास्थ्य विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस स्थिति के लिए मोदी का अति आत्मविश्वास और नेतृत्व की प्रभुत्ववादी स्टाइल भी जिम्मेदार है। आलोचक कहते हैं, उनकी सरकार भारत के पटरी पर लौटने की इमेज बनाने और मंडराते खतरों के बावजूद कारोबार खोलने पर आमादा थी। इस तरह की जानकारी रखने वाले कुछ लोगों ने बताया कि अधिकारियों ने वैज्ञानिकों की इन चेतावनियों को खारिज कर दिया कि भारत की आबादी खतरे के दायरे में है और बहुसंख्यक लोगों में प्रतिरोध की क्षमता (हर्ड इम्यूनिटी) पैदा नहीं हुई है।
देश भर में बढ़ती व्यथा ने मोदी के राजनीतिक रूप से अजेय आभामंडल को नुकसान पहुंचाया हैै। विपक्षी नेताओं ने हमले तेज किए हैं। सत्ता पर हावी होने की वजह से मोदी तीखी ऑनलाइन आलोचना के निशाने पर हैं। संसद के चुनाव तीन साल बाद हैं। उनकी सरकार से दलबदल के कोई संकेत नहीं है इसलिए मोदी की सत्ता सुरक्षित लगती है। उनकी सरकार ने परेशान मरीजों को राहत पहुंचाने के प्रयास तेज किए हैं। फिर भी, विश्लेषक कहते हैं, मोदी का दबदबा होने के कारण अधिक लोग उन्हें देशभर में बीमारी और मौतों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानेंगे। पॉलिसी रिसर्च सेंटर, नई दिल्ली के आसिम अली कहते हैं, अधिक दोष मोदी के शासन करने की शैली का है। मंत्रियों का चयन योग्यता की बजाय वफादारी को ध्यान में रखकर हुआ है। पारदर्शिता के मुकाबले गोपनीयता और इमेज बनाए रखने को प्राथमिकता मिलती है। भारत वैक्सीन का सबसे बड़ा निर्माता है पर उसने अपने बचाव के लिए पर्याप्त डोज नहीं खरीदी हैं। संक्रमण बढ़ने के बीच मोदी ने भीड़ भरे आयोजनों को बढ़ावा दिया। विधानसभा चुनावों में मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने लगातार बड़ी रैलियां की हैं। विश्लेषक कहते हैं, मोदी ने विशेषज्ञों की बजाय सहयोगियों को प्राथमिकता दी है। गलतियां बताने पर अधिकारी आपे से बाहर हो जाते हैं। वैसे, किसी अन्य नेता को भी चुनौतियां का सामना करना पड़ता। विश्व बैंक का कहना है, भारत में लंबे समय से जनस्वास्थ्य सुविधाओं की उपेक्षा हो रही है।
वोटरों के बीच मोदी लोकप्रिय
कमजोर विपक्ष और हिंदू राष्ट्रवादी समर्थन के कारण मोदी के सत्ता में बने रहने की संभावना है। उन्होंने अपनी छवि में बदलाव किया है। इंटरनेशनल कार्नेगी एनडोमेंट पीस में दक्षिण एशिया प्रोग्राम के डायरेक्टर मिलन वैष्णव कहते हैं, उनके व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण है। सामान्य वोटर के बीच उनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता बहुत ज्यादा है। वैष्णव कहते हैं, लोग मोदी को पसंद करते हैं और उन्हें सही ठहराने के रास्ते खोज लेंगे।
तीन माह तक कोविड टास्क फोर्स की बैठक नहीं
20 स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कोविड-19 टास्क फोर्स की माह में दो बार बैठक होती थी। टास्क फोर्स के संबंध में जानकारी रखने वाले तीन लोगों ने बताया कि 11 जनवरी से 15 अप्रैल के बीच टास्क फोर्स की एक भी बैठक नहीं हुई। दो लोगों का कहना है, सरकार को विश्वास हो गया था कि खतरा टल गया है। कुछ वैज्ञानिक भारत के हर्ड इम्यूनिटी की ओर बढ़ने के सरकारी रुख से चिंतित थे।
