आध्यतम केंद्रित बने भारतीय शिक्षा : डॉ. कृष्ण गोपाल

Lucknow

(www.arya-tv.com)हमारा देश विश्व परिदृश्य में प्राचीनतम देश है इस देश की पहचान विश्व बंधुत्व और लोकमंगल की रही है यद्यपि हमने लंबे संघर्षों के बाद भारत की ज्ञान परंपरा को बचा के रखा है आखिर वह कौन सी बात है जो हमें एक सूत्र में जोड़कर रखती है ।
उक्त बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने लखनऊ विश्विद्यालय में तीन दिवसीय अखिल भारतीय संस्थागत नेतृत्व समागम 2024 के दूसरे दिन के अंतिम सत्र में कही आज दुनिया भारत को देखना सुनना और समझना चाहती है भारत की ज्ञान परंपरा पर केंद्रित विविधताओं से भरे जीवन दर्शन पर शोध, विमर्श और चर्चा करने के लिए विश्व के अनेक देश लगे हैं। हमारे यहां शिक्षा व्यवस्था इतनी समृद्ध रही है कि काल गणना, ज्योतिष ज्ञान, नक्षत्र की गति इन सब विधाओं के ज्ञान की बात हमारे ऋषियों, मनीषियों , विद्वानों, आचार्यों ने हजारों वर्ष से करते आए हैं। गीता में रामायण में उपनिषद में भारतीय ज्ञान परंपरा विद्यमान है, भारत में ज्ञान का केंद्र तक्षशीला , नालंदा, काशी अनेक वर्षों से शिक्षित और संस्कारित करने का कार्य करते रहे । यह बात भी उतनी ही सच है की ग्रीक आक्रमण से 2 हजार साल तक संघर्ष का दौर् रहा देश ने देखा फिर भी भारतीय समाज अपने मूल के साथ खड़ा रहा बना हुआ है ।

इतिहास न सब दिन हो सोता है युग बदलता है। परिवर्तन के दौर में हम बहुत तेज गति से विश्व के सामने बढ़ रहे हैं 10 वर्ष के आयु के बच्चे हमारे यहां 98% स्कूल जाते हैं स्वतंत्रता के समय भारत संघर्ष करते-करते कमजोर हो गया था उसी कमजोरी के कारण विश्व के देश भारत पर हंसते थे कि यह देश समाप्त हो जाएगा यह देश नष्ट हो जाएगा लेकिन यह देश अभी भी खड़ा है और पूरी दुनिया के तरफ सीना तान के अपनी समृद्धि के साथ क्योंकि भारत का चिंतन आध्यात्मिक
है।

डॉ. कृष्ण गोपाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज पूरी दुनिया जानना चाहती है भारत में आखिर कौन सी ताकत है कौन सी शक्ति है कौन सा बल है जो भारत को भारत बना के रखा है भारत की आध्यात्मिक शक्ति में संगीत है संगीत का स्वर है भारतीय ज्ञान परंपरा में संगीत के द्वारा शांति समावेशी लोकमंगल की बात का स्वर होता है जिस पर आधारित मनुष्यता मनुष्य के आत्मा को शांति देते हुए संगीत विविध भाषाओं का बोध कराती है।

भारत का जीवन दर्शन और जीवन पद्धति प्रकृति पर आधारित है। प्रकृति के उपासक भारतीय समाज प्रकृति की सेवा करता है जबकि पश्चिम का चिंतन प्रकृति को उपभोग करना है और भारतीय चिंतन दर्शन प्रकृति की पूजा करना है यही अंतर नेशन और राष्ट्र में है नेशन वर्चस्व की बात करता है नेशन संघर्ष और अस्तित्व के लिए लड़ता है जबकि राष्ट्र त्याग की भावना है सेवा की भावना है, राष्ट्र में प्रकृति और व्यक्ति दोनों एक दूसरे के उपासक है। पेड़ धूप में बारिश में भी खड़ा रहकर दूसरे को छाव देता है नदी बहती है दूसरे को जल देती है भारत का चिंतन व्यक्ति से ऊपर होकर मनुष्यता की तरफ ले जाता है यह हमारा है यह तुम्हारा है इस चिंतन से मुक्त भारतीय समाज है सर्व स्पर्शी है जो संपूर्ण मानवता की सेवा के लिए है।

व्यष्टी से समष्टि यही भारतीय दर्शन है यही भारतीय अध्यात्म है । पश्चिम ने शिक्षा तो दी लेकिन संस्कार नहीं दिया वहां जो कमाता है वही खाता है वही मालिक है और भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति में त्याग सबसे बड़ा धर्म माना है हम दूसरे की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं । शिक्षा द्वारा संस्कार का निर्माण होता है यही भारतीय ज्ञान परंपरा है। सुचिता नैतिकता और संस्कार से हम पूरे समाज को एक सूत्र में बांध के रखे हैं आज आवश्यकता है भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मूल्य आधारित शिक्षा की समाज आधारित शिक्षा की भारत बोध आधारित शिक्षा जो भारतीय परंपराओं को भारतीय मूल्यों को भारतीय के युवा पीढ़ी से परिचित कराए और पीढ़ियां समाज और राष्ट्र के प्रति श्रद्धा भाव रखें तभी यह भारत पुनः अपने गौरवशाली शिक्षा व्यवस्था को समृद्ध कर सकेगा ।