अंग्रेजों की जमाने की बरेली कोतवाली का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही लंबी यहां वर्दी के साथी घोड़ों की कहानी है। पुलिस अस्तबल की शान हिटलर, फेंटम, राजा, कोहिनूर, बादल, तूफान जैसे जाबांज घोड़े दंगा-फसाद की चुनौती से लेकर खेल के मैदानों तक फोर्स का मान बढ़ाते नजर आ रहे हैं। जवानों के साथ सड़कों पर कदम से कदम मिलाकर चलने वाले इन घोड़ों का अनुशासन देखते ही बनता है। मार्डन पुलिस और अत्याधुनिक साजो-सामान के दौर में भी घोड़े अपनी उपयोगिता साबित कर रहे हैं, इसलिए अस्तबल में कुछ और घोड़े शामिल करने की बात चल रही है।
बरेली पुलिस में घोड़ों का इतिहास जानने के लिए 1927 से पहले दौर को समझना जरूरी है। बरेली शहर कोतवाली उन दिनों कुतुबखाना के पास हुआ करती थी। 1857 की क्रांति में उसी कोतवाली के बाद जंग-ए-आजादी के सिपाहियों ने ब्रिटिश फौज के दस्तावेज फूंक डाले थे। उसी पुरानी कोतवाली में ब्रितानिया हुकूमत ने स्वतंत्रता के नायक खान बहादुर खान को 24 फरवरी 1860 को फांसी दी थी। कुतुबखाना इलाके में भीड़ बढ़ने की वजह से बाद में उसे शिफ्ट किया, जो कि बाग ब्रिगटान में नया भवन बनाया गया था, जो कि उस समय की नई कोतवाली और आज की शहर कोतवाली है। ऐसाब कहा जाता है कि करीब 100 साल पुराने इतिहास को अपने में समेटे इसी कोतवाली से पुलिस के घोड़ों का प्रथम अध्याय भी लिखा गया था। कोतवाली के पास ही अंग्रेजों की पुलिस की घुड़सवार टुकड़ी और अस्तबल बनाया गया था। शहर कोतवाल घोड़े पर बैठकर ही गश्त पर निकलते थे।
उसी समय के चर्चित कोतवाल बरेली मोहम्मद अमीर के साथ उनके काले घोड़े सिकंदर ने भी बहुत सुर्खियां बटोरी थीं। सिर पर पुलिसिया पगड़ी, हाथ में हंटर और शानदार सिकंदर पर बैठकर जब कोतवाल अमीर शहर में गश्त पर निकलते थे, तो सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था। बरेली पुलिस में घोड़ों की परंपरा आज तक कायम चली आ रही है। पुलिस अस्तबल में नई पीढ़ी के 13 घोड़े मौजूद हैं और सबकी किताब एक से बढ़कर एक कारनामों से भरी दिखती है। घुड़सवारी के शौकीन एसएसपी अनुराग आर्या जरूरत के समय शहर में घोड़े पर सवार होकर निकलते हैं तो अतीत-वर्तमान के इतिहास का समागम सा नजर आता है।
