प्रेम से पगी लाठियां क्यों बरसतीं हैं दो गांवों में, जानिये क्या है पूरा मामला

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आगरा(www.arya-tv.com)  एक रंग विविध रंगों का एक और रंग है। जो प्रेम का रंग माना जाता है। जो जग को प्रीत की रीत समझाने, मनमीतों ने रचीं विविध लीलाएं। प्रेम की धारा को राह दिखाने वाली एक ओर राधा और दूसरी और हर कला से पूर्ण कान्‍हा। दो रूप लेकिन प्राण एक।

एक अहसास प्रेम का। राधारानी का धाम बरसाना प्रेम के इसी अहसास से यूं तो सदैव से ही परिपूर्ण रहा है लेकिन होली के अवसर पर प्रेम का रंग इस अहसास को एक अलग अलौकिकता से संवार देता है। श्री कृष्‍ण कहते हैं कि संसार में कोई ऐसा नहीं जिसे प्रेम न हो।

लेकिन जो प्रेम अपने आराध्‍य के प्रति हो वही प्रेम जीवन धारा को राह देता है। इसी प्रेम से वशिभूत होकर फाल्‍गुन की नवमी पर लाखों श्रद्धालु बरसाना की लठामार होली की एक झलक देखने भर को पहुंच चुके हैं।

लाडि़ली जी के मंदिर की सीढि़यों से रंगीली गली तक बस भक्‍त ही भक्‍त दिखाई दे रहे हैं और राधे राधे की गूंज सुनाई दे रही है। शाम साढ़े पांच बजते ही बरसाना की हुरियारने नंदगांव के हुरियारों पर लठ्ठ बरसाना शुरु करेंगी। तो हरियारे प्रेम से पगे लठ्ठों से बचने के सारे यतन भी करेंगे लेकिन आनंद आएगा प्रेम की लाठिया खाने में ही।

कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण फागुन सुदी नवमी को होली खेलने बरसाना गए और बिना फगुवा (नेग) दिए ही वापस लौट आए। बरसाना की गोपियों ने कन्हैया से होली का फगुवा लेने के लिए नंदगांव जाने की सोची।

इसके लिए राधाजी ने बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया और बताया कि कन्हैंया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। अगले दिन ही (दशमीं) को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा-