भगवान बुद्ध की तपोस्थली श्रावस्ती सोमवार को अनुयायियों से गुलजार रहीम श्रीलंका से आये बौद्ध अनुयायियों ने गंधकुटी पर विशेष पुष्प पूजा किया। बौद्ध भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो की अध्यक्षता में आयोजित विशेष फूल पूजा के दौरान बौद्ध भिक्षु ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पुष्प का उच्च स्थान है।
देवी-देवताओं व भगवान की आरती, व्रत, उपवास या पर्वो पर पुष्प चढ़ाए जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, संस्कार, सामाजिक व पारिवारिक कार्यों को बिना पुष्प अधूरा समझा जाता है। पुष्पों की सुगंध से देवता प्रसन्न होते हैं। सुंदरता के प्रतीक पुष्प हमारे जीवन में उल्लास, उमंग, प्रसन्नता के प्रतीक हैं।
पुष्प के संबंध में कहा गया है कि पुष्प को बढ़ाने, पापों को भगाने और श्रेष्ठ फल को प्रदान करने के कारण यह पुष्प कहा जाता है। जो शोभा देती है, वह माला है, भगवान को जो पुष्पों की मालाएं चढ़ाई जाती हैं, उनमें कमल अथवा पुंडरीक की माला को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।
वहीं पूजन के उपरांत अनुयायियों ने तपोस्पथली स्थित कौशाबी कुटी, आनंद बोधि, सूर्यकुंड, शिवली स्तूप, कच्ची कुटी, पक्की कुटी की परिक्रमा कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की। इस दौरान समूची तपोस्थली बुधम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि के उद्घोष से गुंजायमान रही।
