पिछले दिनों भोपाल स्थित बरकतुल्लाहह विश्वविद्यालय (BU) का नाम बदलकर ‘वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय’ करने के प्रस्ताव ने मध्य प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। नाम बदलने वालों के अनुसार यह बदलाव राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप एक तीखा राजनीतिक विवाद उत्पन्न हो गया है। इस प्रतिष्ठित संस्थान का नाम बदलने की उठती मांगें न केवल इसके ऐतिहासिक महत्व को कम करती हैं, बल्कि अनावश्यक वैचारिक टकराव को भी जन्म देती हैं। किसी भी शैक्षणिक संस्थान की मुख्य पहचान उसकी शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और विद्यार्थियों के भविष्य से होती है, न कि नाम बदलने की राजनीति से।
आज के डिजिटल और प्रतिस्पर्धी युग में जब दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालय अपनी रैंकिंग, वैश्विक शोध (Global Research) और प्लेसमेंट रिकॉर्ड के लिए जाने जाते हैं, तब हमारे देश में एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान का नाम बदलने की चर्चा होना बेहद निराशाजनक है। भोपाल के बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय (BU) के नाम परिवर्तन को लेकर उठ रही मांगें यह दर्शाती हैं कि हमारी प्राथमिकताएं कितनी भटक चुकी हैं। किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान उसकी दीवारों पर लिखे नाम से नहीं, बल्कि उसके क्लासरूम में मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता से तय होती है।
वर्ष 1970 में स्थापित इस विश्वविद्यालय को मूल रूप से भोपाल विश्वविद्यालय के नाम से ही जाना जाता था। फिर 1988 में कांग्रेस की अर्जुन सिंह की सरकार के दौरान इसका नाम स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतुल्लाहह भोपाली के सम्मान में परिवर्तित किया गया, इसलिए अगर इस बार फिर इस विश्वविद्यालय का नाम बदलता है तो यह तीसरा परिवर्तन होगा।
मौलाना बरकतुल्लाह इसी धरती के थे और इसी धरती की आज़ादी के लिए ज़िंदगी भर लड़ते रहे। इतिहास तो यही कहता है। जो लोग नाम बदलने के पक्ष में तर्क दे रहे हैं, उनके अनुसार यह पहली बार नहीं है, जब मध्य प्रदेश में किसी संस्थान या जगह का नाम बदला गया है। इससे पहले हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति स्टेशन, होशंगाबाद का नाम बदलकर नर्मदापुरम् और इस्लामपुर का नाम बदलकर जगदीशपुर किया जा चुका है।
मौलाना बरकतुल्लाह उन शुरुआती भारतीय क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने उस समय अंग्रेजी सरकार को वैश्विक स्तर पर चुनौती देने का साहस दिखाया, जब भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अपने शुरुआती चरण में था। वे अमूमन देश के बाहर ही रहे ख़ास कर इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी और अफगानिस्तान में और वहीं से वे भारत की आज़ादी के लिए कार्य करते रहे।
उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए जनमत तैयार करने और अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल करने में महती भूमिका अदा की। इसी सिलसिले में पहली दिसम्बर 1915 को काबुल में स्थापित ‘भारत की निर्वासित सरकार’ में जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस से पहले की सरकार थी, यानी कि पहली निर्वासित सरकार, उसमें उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया था।
