नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मंगलवार को केरलम में स्थित सबरीमाला के मामले समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से कथित भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे व सीमा से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने लिखित दलीलें देकर शीर्ष अदालत से सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को बरकरार रखने का अनुरोध किया। केंद्र ने कहा कि यह मामला धार्मिक आस्था और संप्रदायिक स्वायत्तता के दायरे में आता है और न्यायिक समीक्षा से परे है। सितंबर 2018 में, पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। बाद में 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3:2 के बहुमत से इस मुद्दे को बड़ी पीठ को भेज दिया था।
इस फैसले में केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश तथा गैर-पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के अगियारी (पवित्र अग्नि स्थल) में प्रवेश के मुद्दों को भी बड़ी पीठ के पास भेजा गया। 11 मई 2020 को एक अन्य पीठ ने माना कि समीक्षा अधिकार के तहत भी पांच-न्यायाधीशों की पीठ को कानूनी मामलों को बड़ी पीठ को भेजने का अधिकार है।
16 फरवरी को शीर्ष अदालत ने कहा था कि इस मामले में अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू होगी, जो 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग का समर्थन करते हैं, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को केरल स्थित इस पहाड़ी मंदिर शबरिमला में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
