नागार्जुन: जिसने महलों की नहीं, बल्कि खेतों, खलिहानों और आम आदमी की पीड़ा को अपनी कलम की धार बनाया

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जन-जन के कवि: बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) को नमन!! आज हम याद कर रहे हैं हिन्दी और मैथिली साहित्य के उस ‘अक्खड़’ और ‘फक्कड़’ फनकार को, जिसने महलों की नहीं, बल्कि खेतों, खलिहानों और आम आदमी की पीड़ा को अपनी कलम की धार बनाया। वैद्यनाथ मिश्र, जिन्हें दुनिया ‘नागार्जुन’ और प्यार से ‘बाबा’ कहती है, आधुनिक कविता के कबीर थे।
वह केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि एक ऐसे घुमक्कड़ थे जिन्होंने पूरे भारत को अपनी आंखों से देखा और अपनी कविताओं में उतारा।प्रमुख साहित्यिक योगदान और विशेषताएँ:
* जनकवि: उन्होंने सत्ता के गलियारों से लेकर किसान की झोपड़ी तक पर बेबाकी से लिखा। उनकी कविता “अकाल और उसके बाद” आज भी साहित्य की अमर धरोहर है।
* मैथिली के ‘यात्री’: मैथिली साहित्य में उन्होंने ‘यात्री’ उपनाम से रचनाएँ कीं और आधुनिक मैथिली कविता को नई दिशा दी।
* बहुभाषी रचनाकार: हिन्दी और मैथिली के अलावा उन्होंने संस्कृत और बांग्ला में भी उत्कृष्ट साहित्य सृजन किया।
* पुल की तरह व्यक्तित्व: छायावाद के बाद की प्रगतिशील और जनवादी कविता के बीच वह एक मजबूत सेतु की तरह थे।
“जनता की बातें जनता की भाषा में कहना ही सच्ची कविता है।” — बाबा नागार्जुन का पूरा जीवन इसी सिद्धांत पर आधारित रहा।

संक्षिप्त आंकड़े (Timeline):

* जन्म: 30 जून 1911 (सतलखा, मधुबनी, बिहार)
* साहित्य अकादमी पुरस्कार: 1968 (मैथिली कविता संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए)
* प्रसिद्ध कृतियाँ: युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, भस्मांकुर, बाबा बटेसरनाथ (उपन्यास)।
* सम्मान: भारत भारती सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार।