1.भारतीय प्राचीन राजा, राजा भोज का ‘समरांगण सूत्रधार’ वास्तव में संस्कृत वास्तु और यंत्र विज्ञान का महाग्रंथ कहा जा सकता है। जिसे मालवा शासक राजा भोज ने लिखा था। जिसका विषय वास्तुशास्त्र, नगर योजना, मूर्तिकला, जल-प्रणालियाँ, यांत्रिक यंत्र समझाते हुए लगभग 83 अध्याय हैं। इसका प्रमुख योगदान वास्तु-तंत्र जिसमें घर, महल, शहर, दुर्ग, मंदिर इनके निर्माण के विस्तृत सूत्र हैं। भवन-भूगोल में भूमि-परीक्षण, दिशा-निर्धारण, नाप तोल व अनुपात समझाया है मूर्ति लक्षण के अंतर्गत देवमूर्तियों की ऊँचाई प्रमाण, मुद्रा, आयाम दिए हैं। हथियार एवं रक्षा यंत्र में ध्वस्त वीर्य दुर्ग, गुप्त मार्ग, अग्नि-यंत्र इत्यादि का जिक्र है। वहीं ऑटोमेटिक मशीनें भी समझाई हैं।चलित-पुरुष यंत्र (Automatic humanoids) कुछ ऐसा वर्णन मिलता है कि दरवाजे पर खड़े यांत्रिक पुरुष मेहमान का स्वागत करते थे। उदाहरण जैसे जल चालित घड़ियाँ (Water clocks), कपाट यंत्र (self-opening doors) इत्यादि लिए हैं। समरांगण सूत्रधार भारतीय वास्तुकला को केवल देव-निर्माण से नहीं, बल्कि उपयोगी विज्ञान और ‘प्रोटो-इंजीनियरिंग’ से जोड़ता है।
2.चाणक्य का ‘अर्थशास्त्र’ राजनीति, अर्थनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का शास्त्रीय ग्रंथ है। जिसको कौटिल्य / विष्णुगुप्त / चाणक्य (4th century BCE) के नाम से जानते हैं। जो शासन व्यवस्था, अर्थनीति, विदेश नीति, सैन्य नीति, खुफिया-तंत्र हेतु समझाती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। राज्य के सात अंग (सप्तांग) जो स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड, मित्र हैं। गुप्तचर तंत्र में कौटिल्य का खुफिया नेटवर्क दुनिया का सबसे संगठित प्रारूप माना जाता है। अर्थ-व्यवस्था में उत्पादन, कर-विधान, व्यापार, मापन, मुद्रा, खनन, वन-व्यवस्था दी है। दण्डनीति में अपराध नियंत्रण, दंड विधान, सेनानायकों के कर्तव्य, युद्ध-युक्तियाँ सुझाई है। वहीं मंडल-सिद्धांत में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का पहला वैज्ञानिक मॉडल दिया है ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ होता है। अर्थशास्त्र आधुनिक राजनीति-विज्ञान, अर्थशास्त्र और कूटनीति के क्षेत्र में आज भी संदर्भ-ग्रंथ माना जाता है।
3.भारद्वाज का विमान-शास्त्र प्राचीन भारतीय विमान ज्ञान है ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है। भारद्वाज ‘नवव्योम’ और ‘वायुतन्त्र’ के ज्ञाता माने जाते हैं। विमान संबंधित श्लोकों का उल्लेख बाद के ग्रंथों में मिलता है। जो ग्रंथ आज “विमानिक शास्त्र / वैमानिक शास्त्र” के रूप में उपलब्ध है, वह 20वीं सदी में लिखी पांडुलिपि है (पं. सुब्बाराव शास्त्री द्वारा कथित श्रुति) है। इसकी भाषा प्राचीन संस्कृत शैली में है, परंतु विद्वानों द्वारा इसकी रचना-तिथि आधुनिक (20वीं सदी) मानी जाती है। यह फिर भी यह किन बातों के कारण प्रसिद्ध है। इसमें विमानों के चार प्रकार के वर्णन हैं। शक्तियान, मंधक, रुक्म व त्रिपुर। धातु शास्त्र (Alloys) में अनेक ‘मृदु-धातु’ और ‘कठोर-धातु’ मिश्रणों का वर्णन है। ऊर्जा-तंत्र में “प्राण-शक्ति”, “सोलर-चालित यंत्र”, “वात-यंत्र” जैसी अवधारणाएँ दी हैं। यंत्र-सुरक्षा तकनीक के अंतर्गत शत्रु से छिपने, दिशा बदलकर बचने, अग्नि-निरोधक आवरण आदि। ऐतिहासिक रूप से इसकी तिथि विवादित है, परंतु ‘भारद्वाज का विमान-ज्ञान’ भारतीय वैज्ञानिक कल्पना और तकनीकी परंपरा का महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक हिस्सा माना जाता है।
4.‘यंत्र सर्वस्यं’ प्राचीन भारतीय यांत्रिकी एवं ऑटोमेशन का अद्भुत ग्रंथ है। यह परंपरा इसे रविदत्त, भवमिश्र और ‘दत्तोत्तर’ परंपरा से जुड़ती है। इसके विषय यांत्रिक यंत्र, ऑटोमेशन, क्लॉकवर्क, गुप्त यंत्र, रक्षा उपकरण हैं। इसमें मिलता है। स्वचालित यंत्र (Automation) जिसमें
स्वचालित-द्वार, स्वयंचालित लड़ाकू यंत्र, जल चालित संगीत यंत्र और नाट्य-यंत्र (Mechanized theatre devices) ज्योतिष यंत्र, छाया-यंत्र, घटी यंत्र (समय मापने वाले उपकरण) सैन्य यंत्र के अंतर्गत बाण उत्सर्जक यंत्र, गुप्त अग्नि यंत्र, दीप यंत्र (सिग्नलिंग डिवाइसेस) इत्यादि। यंत्र सर्वस्यं भारतीय ‘मेकेनिकल इंजीनियरिंग’ का प्रारंभिक बीज-मंत्र माना जाता है। भारत की वैज्ञानिक परंपरा में इन चारों ग्रंथों की संयुक्त भूमिका समरांगण सूत्रधार से इंजीनियरिंग व वास्तुकला। अर्थशास्त्र से शासन व सैन्य विज्ञान और अर्थव्यवस्था। भारद्वाज विमान शास्त्र से तकनीकी कल्पना व धातु विज्ञान परंपरा। यंत्र सर्वस्यं से ऑटोमेशन व यांत्रिकी। इन चारों को साथ रखें तो प्राचीन भारत में यह स्पष्ट दिखता है कि हमारी परंपरा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि अत्यंत तकनीकी, इंजीनियरिंग उन्मुख और वैज्ञानिक दृष्टि से प्रगतिशील थी।
