Lakhimpur News : आंखों के सामने घरों को निगल रही शारदा, पानी की धार निहारते बेबस ग्रामीण

# ## Bareilly Zone

तराई के तटीय इलाकों में बारिश से तबाह ग्रामीणों के सामने अब वजूद का संकट गहराया है। पीलीभीत से लेकर बदायूं और लखीमपुर खीरी तक, नदियों के किनारे आबाद कई गांव खतरे हैं। पीलीभीत में कटान करती हुई शारदा नरोसा गांव की तरफ बढ़ने लगी है। उधर, लखीमपुर खीरी में शारदा रूरा सुलतानपुर गांव को निगलने को आतुर दिख रही है। कटान का खतरा सिर पर आने के बाद कई परिवार गांव छोड़कर चले गए तो कुछ शारदा का रौद्र रूप देख रहे हैं।

लखीमपुर खीरी में बड़ा भावुक और झकझोरने वाला मंजर है। जिस घर में पले-बढ़े वही अब मिटने के करीब है। गुरुवार को एक ग्रामीण एक टक नदी को निहार रहे थे। इसी उधेड़बुन में गुम थे कि मकान नदी में चला गया तो फिर कहां रहेंगे? परिवार को छत कैसे दिलाएंगे? यहां केवल घर ही नहीं, बल्कि खेतीहर जमीन भी नदी निगलती जा रही है। सब कुछ शारदा में चला गया तो जिंदगी कैसे बसर करेंग?

ऐसे कई सवालों से जूझते ग्रामीणों के चेहरों पर मायूसी साफ छलक रही है। बेबसी और हताशा भी दिख जाती। गुरुवार को बबूनजी नदी की धार के साथ कटती जमीन देखते तो कभी किनारे। शोर मचाती नदी उनके घर की दहलीज तक पहुंच चुकी है। सामान समेट दिया। लेकिन चारा मशीन समेत मकान और बाकी और भी सामान घर में है। खतरा करीब है, बेबसी के सिवा हाथ में कुछ भी नहीं।

गांव छोड़कर जा चुके दर्जनों परिवार

 रूरा सुल्तानपुर में शारदा का कटान पहले ही दर्जनों परिवारों को बेघर कर चुका है। अब रामपाल, प्रेम चंद, राजबिहारी, भिखारी, बबूनजी और कलावती के मकान निशाने पर हैं। किसी भी पल ये घर नदी में समा सकते हैं। कई परिवार अपना जरूरी सामान समेटकर चले गए हैं। इनमें छोटे लाल, लालता प्रसाद, हरिहर सिंह, रामशरण, पप्पू, सुरेश, अशोक, लालबहादुर और रामपाल सिंह शामिल हैं।

गांव से काफी भावुक विदाई हो रही है। रोते-बिलखते और अश्कजार ग्रामीण अपने घरों को मुड़कर देखते हैं। शायद अब यहां कभी लौटना नहीं होगा। गांव, गांव नहीं बल्कि नदी हो जाएगा।

घटता जलस्तर, बढ़ता कटान

ग्रामीणों के मुताबिक शारदा का जलस्तर कम होने के बावजूद कटान जारी है। पानी घटने के साथ नदी का किनारा कमजोर पड़ रहा है और धार लगातार जमीन काट रही है। इससे नदी किनारे बसे परिवारों की चिंता और बढ़ गई है। ग्रामीणों के लिए यह महज जमीन का कटना नहीं है। इसी जमीन पर उनके घर हैं, बच्चों का बचपन है और जिंदगीभर की जमा-पूंजी है। ऐसे में नदी किनारे बैठा बबूनजी का चेहरा उस बेबसी की तस्वीर बन गया है, जिसमें आंखों के सामने अपना आशियाना है और कुछ ही दूरी पर उसे निगलती शारदा की धार।