न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि पड़ोसी देश से उत्पन्न होने वाला आतंकवाद भारत की प्रमुख चिंताओं में से एक है और यदि नयी दिल्ली के साझेदार इस चिंता को पूरी तरह नहीं समझते हैं, तो इसका द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ता है। उनका यह बयान अमेरिका और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी के बीच भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में आया है।
भारत की चिंताओं को नजरअंदाज करना रिश्तों पर पड़ेगा भारी
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के उच्चस्तरीय सप्ताह के सोमवार को समापन के अवसर पर एशिया सोसाइटी की ओर से आयोजित एक विशेष संवाद में जयशंकर ने भारतीय-अमेरिकी और प्रवासी भारतीय समुदाय के प्रमुख सदस्यों के साथ-साथ नीति विशेषज्ञों को संबोधित किया। पूर्व अमेरिकी राजनयिक और ‘एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ के विशिष्ट फेलो डेनियल रसेल द्वारा संचालित इस संवाद के दौरान जयशंकर से भारत-अमेरिका संबंधों के बारे में सवाल किया गया।
उनसे खासतौर पर पिछले एक वर्ष के दौरान व्यापार और शुल्कों से जुड़े घटनाक्रम तथा द्विपक्षीय संबंधों को ”बेहतर दिशा” में ले जाने के लिए क्या किए जाने की जरूरत है, इस बारे में पूछा गया। जयशंकर ने कहा, ”अगर मैं व्यापक नजरिए से देखूं… तो मैं देखता हूं कि दुनिया के कई देशों के अमेरिका के साथ संबंध अधिक कठिन रहे हैं। मेरा मतलब है कि इससे हमें सांत्वना शायद न मिले, लेकिन यह एक वास्तविकता है।”
आतंकवाद और पाकिस्तान पर दिया बड़ा बयान
इसके बाद उन्होंने अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंधों का जिक्र किया, जिनमें पिछले एक वर्ष के दौरान सुधार आया है, खासकर जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के कुछ ही महीनों बाद। जयशंकर ने कहा कि एक मुद्दा ”हर देश की संवेदनशीलताओं से जुड़ा है।” उन्होंने कहा, ”भारत के लिए जो बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, वह आतंकवाद का मुद्दा है। हमारा मानना है कि… शायद बहुत कम ऐसे देश हैं, जिन्हें कई दशकों से किसी पड़ोसी देश की ओर से जानबूझकर और सुनियोजित नीति के तहत उस तरह के आतंकवाद का सामना करना पड़ा है, जैसा हमने किया है।”
पाकिस्तान का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा, ”अब, अगर जो बात हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण है, उसके बारे में पर्याप्त समझ या सराहना या सहानुभूति नहीं है, तो मुझे लगता है कि इससे भी एक समस्या पैदा होती है। यदि मेरी प्रमुख चिंताओं में से किसी एक को मेरा साझेदार पूरी तरह नहीं समझता है, तो स्पष्ट रूप से इसका संबंधों पर असर पड़ता है।”
ऑपरेशन सिंदूर का भी किया जिक्र
पिछले साल मई में भारत ने, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकवादी हमले के जवाब में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था। इस हमले को पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने अंजाम दिया था और इसमें 26 लोग मारे गए थे जिनमें से ज्यादातर पर्यटक थे।
पिछले पूरे साल और यहां तक कि गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन में भी ट्रंप ने दावा किया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष को रुकवाया था। भारत लगातार किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से इनकार करता रहा है। पिछले साल जून में कनाडा के कनानास्किस में आयोजित जी7 नेताओं के शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद ट्रंप ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर की व्हाइट हाउस में दोपहर के भोजन पर मेजबानी की थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और मुनीर ने पिछले साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान व्हाइट हाउस में ट्रंप से फिर मुलाकात की थी। ट्रंप ने विभिन्न मौकों पर सार्वजनिक रूप से मुनीर की प्रशंसा की और उन्हें ”महान जनरल, महान फील्ड मार्शल, एक महान व्यक्ति” बताया। जयशंकर ने कहा, ”हम निश्चित रूप से उम्मीद करेंगे और अपेक्षा करेंगे कि भारत-अमेरिका संबंध आगे बढ़ते हुए बेहतर दिशा में जाएं। लेकिन मुझे सामने मौजूद मुद्दों को लेकर वास्तविकता को ध्यान में रखना होगा और जिस हद तक हम इनमें से कुछ मुद्दों पर आगे बढ़ने में सक्षम होंगे, मुझे लगता है कि हमारे संबंध बेहतर होंगे।’
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर दिया बयान
व्हाइट हाउस (अमेरिकी राष्ट्रपति का आधिकारिक आवास एवं कार्यालय) में ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के कुछ ही महीनों बाद भारत-अमेरिका संबंधों में शुल्क, व्यापार, नयी दिल्ली द्वारा रूसी ईंधन की खरीद और वाशिंगटन की पाकिस्तान के साथ फिर से बढ़ती भागीदारी जैसी चुनौतियों को लेकर उतार-चढ़ाव देखने को मिला। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच यदि व्यापार समझौता संपन्न होता है, तो इससे दोनों देशों के संबंध ”बेहतर” होंगे। उन्होंने कहा कि वार्ता में तेजी से प्रगति की उम्मीद के सामने जमीनी हकीकत कहीं अधिक जटिल रही है।
