इंदौर के खाचरौद स्थित एक मंदिर की संपत्ति को लेकर करीब सात दशक से चले आ रहे विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर में विराजित भगवान राम की मूर्ति ही मंदिर की संपत्ति की वास्तविक मालिक मानी जाएगी. कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर से जुड़ी संपत्ति का इस्तेमाल धार्मिक और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए. लंबे समय से लंबित इस मामले के फैसले के बाद मंदिर की संपत्ति के अधिकार को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है.
मंदिर की संपत्ति को लेकर विवाद की शुरुआत वर्ष 1954 में हुई थी. मंदिर के महंत, माहेश्वरी समाज और सरकार के बीच संपत्ति के अधिकार को लेकर मतभेद सामने आए थे. अलग-अलग पक्षों ने मंदिर और उससे जुड़ी जमीन पर अपने-अपने अधिकार का दावा किया था. विवाद बढ़ने के बाद मामला न्यायालय तक पहुंचा. वर्ष 1968 में इस संबंध में इंदौर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई. इसके बाद से मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में रहा. करीब सात दशक के दौरान इस मामले में कई स्तरों पर दलीलें और दस्तावेज अदालत के सामने रखे गए.
मंदिर की संपत्ति पर अलग-अलग दावे
मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित पक्षों की ओर से मंदिर और उसकी संपत्ति पर अधिकार को लेकर अलग-अलग दावे किए गए. विवाद का मुख्य सवाल यह था कि मंदिर से जुड़ी संपत्ति का वास्तविक स्वामी किसे माना जाए और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाना चाहिए.
लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार किया गया. मामले के लंबे समय से लंबित रहने के कारण इसका फैसला मंदिर की संपत्ति के भविष्य के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था.
भगवान राम की मूर्ति को माना संपत्ति का मालिक
मामले की सुनवाई के बाद इंदौर हाई कोर्ट के जस्टिस विनय सराफ ने फैसला सुनाया. अदालत ने मंदिर में विराजित भगवान राम की मूर्ति को मंदिर की संपत्ति का वास्तविक मालिक माना.
अदालत का यह निर्णय मंदिर की संपत्ति के कानूनी स्वामित्व को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि मंदिर की संपत्ति का उपयोग धार्मिक और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए.
करीब सात दशक बाद विवाद पर आया फैसला
यह मामला करीब 70 वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है. वर्ष 1954 में शुरू हुआ विवाद वर्ष 1968 में हाई कोर्ट तक पहुंचा था. इसके बाद लंबे समय तक चली सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के बाद अब अदालत ने इस पर अपना फैसला दिया है.
हाई कोर्ट के निर्णय के बाद मंदिर की संपत्ति के स्वामित्व और उसके इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से चली आ रही कानूनी स्थिति में स्पष्टता आने की संभावना है. अदालत का यह फैसला धार्मिक संस्थानों से जुड़ी संपत्तियों के अधिकार और उनके सार्वजनिक उपयोग के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
