असम में सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा। साल 2014 से लेकर अब तक हुए हर चुनाव में भाजपा की स्थिति लगातार मजबूत होती जा रही है। इस बार राज्य में अपने दम पर पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार बनने जा रही है। भाजपा के ही दम पर उसके सहयोगी दल असम गण परिषद तथा बीपीएफ की भी इस चुनाव में स्थिति अच्छी रही है। भाजपा की इस बड़ी जीत के नायक मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा रहे, जिन्होंने 11 साल के भीतर पार्टी को शिखर पर पहुंचा दिया। साल 2015 में जब वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे, तो भाजपा के सिर्फ पांच विधायक थे, जो 2011 के चुनाव में जीते थे।
भाजपा ने 2021 चुनाव में संकल्प पत्र में जो वादे किए थे, उन्हें न सिर्फ शत प्रतिशत, बल्कि उससे आगे जाकर पूरा किया। बीते 5 वर्षों में डेढ़ लाख से अधिक बेरोजगारों को सरकारी नौकरियां स्वच्छ तरीके से दी गईं, जबकि घोषणा पत्र में एक लाख नौकरी का ही वादा था। महिलाओं के लिए अरुणोदय योजना का सफल क्रियान्वयन हुआ। प्रत्येक महीने की 10 तारीख को महिलाओं के खाते में 1250 रुपये पहुंचते रहे। ‘लखपति बाईदेउ’, ‘निजूत मोइना’ योजनाओं के साथ ही युवाओं के रोजगार, छात्र-छात्राओं की पढ़ाई से लेकर किसानों तक के लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू की गईं।
भाजपा सरकार ने बड़े-बड़े पुल, ओवरब्रिज, चौड़ी सड़कें, रिंग रोड, ब्रह्मपुत्र में टनल और कई पुल बनवाए या निर्माणाधीन हैं। डॉ हिमंत बिस्व सरमा ने मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद से चुनाव प्रचार के अंतिम दिन तक युद्धस्तर पर काम किया तो संगठन ने भी हर दिन चुनाव प्रचार के तरीके से कार्य किया।
विपक्ष के धराशायी होने का कारण
राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस नेतृत्व को लेकर खींचतान से कमजोर होती गई। जनहित से जुड़े मुद्दे उठाने के बदले इसके नेता मुख्यमंत्री के परिवार और भाजपा नेताओं के विरुद्ध प्रचार में लगे रहे। विदेशी घुसपैठियों के विरुद्ध भाजपा सरकार द्वारा की गई कार्रवाई का कांग्रेस ने लगातार विरोध किया। पार्टी अध्यक्ष गौरव गोगोई नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले जोरहाट में मजार पर माथा टेकने पहुंचे। कांग्रेस की इसी नीति से नाराज पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा और सांसद प्रद्युत बरदलै जैसे दिग्गज नेता चुनाव के मौके पर भाजपा में शामिल हो गए और चुनाव जीत गए। गठबंधन पर भ्रम की स्थिति रही। विपक्षी गठबंधन संयुक्त रूप से चुनाव प्रचार भी नहीं कर सका। ऐसें में कांग्रेस विदेशी घुसपैठी बहुल सीटों तक ही सिमट कर रह गई। रही सही कसर कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने पूरी कर दी। उन्होंने मुख्यमंत्री की पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए, फिर उन पर डटकर खड़े रहने के बदले भागते फिरे, जिसका उल्टा असर मतदाताओं पर पड़ा।
