वध 2 एक गंभीर क्राइम-थ्रिलर फिल्म है, जो यह अहम सवाल उठाती है कि जब इंसाफ मिलने में बहुत देर हो जाए, तो एक आम आदमी के पास क्या विकल्प बचते हैं। फिल्म की मूल भावना “देर से मिला न्याय भी न्याय ही होता है” के विचार के इर्द-गिर्द घूमती है।
कहानी का आइडिया दमदार है और यह समाज व सिस्टम से जुड़े कई अहम सवाल खड़ेकरती है, लेकिन स्क्रीन पर इसका असर पूरी तरह बन नहीं पाता। फिल्म की शुरुआत धीमी है और पहले हिस्से में कहानी बहुत आराम से आगे बढ़ती है। कई दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे लगते हैं और कुछ जगह दर्शक को पहले ही अंदाजा हो जाता है कि आगे क्या होने वाला है। हालांकि जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, सस्पेंस बढ़ता है और दूसरे हिस्से में फिल्म कुछ हद तक पकड़ बनाती है। यदि शुरुआती हिस्से को थोड़ा और टाइट रखा जाता, तो फिल्म कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकती थी।
अभिनय के मामले में वध 2 मजबूत नजर आती है। संजय मिश्रा अपने किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं और बिना किसी अतिरिक्त ड्रामे के भावनाओं को प्रभावी ढंग से सामने रखते हैं। नीना गुप्ता भी अपने रोल में सच्चाई और गहराई लेकर आती हैं। खासकर भावनात्मक दृश्यों में उनका अभिनय सराहनीय है। सहायक कलाकारों की भूमिकाएं भले ही सीमित हों, लेकिन कहानी की जरूरत के हिसाब से वे ठीक बैठती हैं।
तकनीकी पक्ष औसत कहा जा सकता है। सिनेमैटोग्राफी ठीक-ठाक है, लेकिन कुछ नया या यादगार पेश नहीं करती। एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी, क्योंकि कई जगह फिल्म खिंची हुई महसूस होती है। बैकग्राउंड म्यूजिक माहौल बनाने की कोशिश करता है, पर वह अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं होता।
क्लाइमेक्स में फिल्म एक स्पष्ट संदेश देने और नैतिक सवाल उठाने की कोशिश करती है। यह हिस्सा दर्शक को सोचने पर मजबूर जरूर करता है, लेकिन जिस गहरे असर की उम्मीद रहती है, वह पूरी तरह उभरकर सामने नहीं आता।
कुल मिलाकर, वध 2 एक अच्छी सोच और मजबूत अभिनय वाली फिल्म है, लेकिन इसकी धीमी रफ्तार और औसत प्रस्तुति इसकी सबसे बड़ी कमजोरियां हैं। यदि आपको गंभीर विषयों पर बनी स्लो-बर्न थ्रिलर फिल्में पसंद हैं और आप तेज-तर्रार मनोरंजन की अपेक्षा नहीं रखते, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।
