वाराणसी(www.arya-tv.com) सन 1669 का। मुगल सलतनत की नींद हराम कर देने वाले बागी राजा छत्रपति शिवाजी आगरा किले की नजरबंदी का तिलिस्म तोड़कर फरार हो चुके थे। पांच हजार स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली का इनाम घोषित हो चुका था।
उनका हाल-पता बताने या उन्हेंं जिंदा या मुर्दा पकड़वाने के लिए। पूरब, पश्चिम, उत्तर हो या दक्षिण औरंगजेबी निजाम के मुखबीर व खबरी जगह-जगह आंख-कान लगाए बागी शिवाजी की मौजूदगी के सुराग ढूंढ रहे थे। इधर, चतुर सयाने शिवाजी महाराज 15-20 दिनों तक जासूसों को छकई का छाक छकाते आज पहुंचे राजाधिराज प्रभू शिवजी की नगरी काशी में।
शिवराज की सूर-वीरता की कहानियां व हिंदू पदपादशादी के चर्चे तो बहुत पहले ही यहां पहुंच चुके थे, किंतु उनकी मुख मुद्रा व व्यक्तित्व से किसी का परिचय न था। फिर भी पूरी गोपनीयता बनाए रखते हुए शिवाजी महाराज ने अस्सी घाट निवासी एक विपन्न ब्राह्मण के घर शरण ली।
