लखनऊ विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा पर मंथन, विकसित भारत के लिए सुधार व नवाचार पर जोर

Lucknow
  • “विकसित भारत 2047” की दिशा में शिक्षा की भूमिका पर संगोष्ठी आयोजित
  • अभाविप व लखनऊ विश्वविद्यालय की संगोष्ठी में शिक्षा सुधार, कौशल व नवाचार पर चर्चा
  • उच्च शिक्षा को कौशल आधारित बनाने पर बल, लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई संगोष्ठी
  • विकसित भारत के लिए शिक्षा में गुणवत्ता, शोध और नवाचार जरूरी: विशेषज्ञ

विकसित भारत के लिए उच्च शिक्षा: सुधार, नवाचार और उत्कृष्टता के तहत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन मालवीय सभागार में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. जे.पी. सैनी ने की, जबकि प्रो. राजशरण शाही और प्रो. वंदना सहगल की विशेष उपस्थिति रही। अपने संबोधन में प्रो. राजशरण शाही ने कहा कि शिक्षा ही राष्ट्र निर्माण का मूल आधार है और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में इसकी केंद्रीय भूमिका है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को समावेशी विकास का माध्यम बताया। प्रो. वंदना सहगल ने शिक्षा को व्यावहारिक एवं कौशल आधारित बनाने पर बल देते हुए कहा कि वर्तमान समय में बहु-विषयक शिक्षा, नवाचार और रचनात्मकता को बढ़ावा देना आवश्यक है।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। उन्होंने विश्वविद्यालयों में स्वायत्तता के साथ जवाबदेही सुनिश्चित करने और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, शोध व नवाचार को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई। प्रांत अध्यक्ष प्रो. नीतू सोमवंशी ने विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 पर अपने विचार रखते हुए शिक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुव्यवस्थित बनाने पर जोर दिया।

तृतीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. जय प्रकाश पाण्डेय ने की। उन्होंने कहा कि यूजीसी के नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क के माध्यम से शिक्षा को अधिक लचीला और कौशल आधारित बनाया जा रहा है। उन्होंने शिक्षा में 70% कौशल और 30% ज्ञान के संतुलन पर बल दिया। समापन सत्र में कुलानुशासक प्रो. राकेश द्विवेदी ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा में सुधार, नवाचार और उत्कृष्टता को साथ लेकर चलना होगा। विशेष आमंत्रित घनश्याम शाही ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार बताते हुए समावेशी विकास और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर जोर दिया। डॉ. अजीत कुमार शासनी ने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए शिक्षा को कौशल और रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

संगोष्ठी संयोजक डॉ. अशोक मोरल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और सभी हितधारकों के बीच संवाद को मजबूत करती हैं। इस अवसर पर घनश्याम शाही, अंशुल विद्यार्थी, प्रो. भुवनेश्वरी भरद्वाज, प्रो. शशि भूषण सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और कार्यकर्ता उपस्थित रहे।