बागपत: देशभर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर तीखी बहस चल रही है। सवर्ण समाज से जुड़े संगठन इन नियमों का विरोध कर रहे हैं, जबकि यह उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लाया गया है। इसी बीच भारतीय किसान यूनियन (BKU) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने इस मुद्दे पर बड़ा बयान दिया है।
बागपत के दौघट में एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में राकेश टिकैत ने कहा कि UGC का यह नया कानून देश में आपसी बैर और मुकदमेबाजी को और बढ़ावा देगा। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों का समाधान कोर्ट-कचहरी के बजाय आपसी समझौते, सहमति और मिल-जुलकर बातचीत से निकालना चाहिए।
इसके अलावा, टिकैत ने देश की बढ़ती जनसंख्या पर गहरी चिंता जताई और सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की। उन्होंने कहा, “देश में जनसंख्या विस्फोट का खतरा मंडरा रहा है। इस तेजी से बढ़ती आबादी के कारण जल्द ही रोजगार के लिए लोग सड़कों पर उतर आएंगे।”
टिकैत ने दो बड़े सुझाव दिए:
1. सरकार को तुरंत एक बच्चा नीतिका सख्त कानून बनाना चाहिए, जो अगले 50 सालतक लागू रहे।
2. इस कानून का पालन न करने वालों से सरकारी सुविधाएं (जैसे सब्सिडी, योजनाओं का लाभ आदि) वापस ली जाएं।
उनका मानना है कि ऐसी नीति से जनसंख्या पर नियंत्रण होगा और भविष्य में बेरोजगारी, संसाधनों की कमी जैसी समस्याओं से बचा जा सकेगा।
UGC का नया नियम क्या है?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य कॉलेजों-यूनिवर्सिटीज में जाति आधारित भेदभाव को पूरी तरह खत्म करना है।
इसके नियम के तहत एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। हर संस्थान में समान अवसर प्रकोष्ठ (Equal Opportunity Centre)और इक्विटी कमेटीका गठन अनिवार्य है। भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत मिलने पर तुरंत दर्ज की जाएगी और कार्रवाई होगी। नियम 15 जनवरी 2026 से सभी UGC से संबद्ध कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लागू हो चुके हैं।
नियमों का पालन न करने पर संस्थानों को मान्यता रद्द करने, फंडिंग रोकने जैसी सख्त सजा मिल सकती है। हालांकि, सवर्ण संगठनों का आरोप है कि यह नियम एकतरफा है और झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ा सकता है।
